भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287
२७६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १४७

संतप्त होकर सारे संसारमें भटकता फिरेगा। फलतः भगवान् शंकर समस्त संसारके स्वामी होते हुए भी उसी क्षण व्याकुल हो उठे और उन्होंने उमा देवीसे कहा—'प्रिये! और्वमुनिकी कठिन तपस्या देखकर देवसमुदायके हृदयमें आतङ्क छा गया था। इसलिये मुझसे उन्होंने प्रार्थना की कि 'भगवन्! अखिल जगत् जल रहा है। फिर भी वे (और्व) इससे बचानेके लिये कोई चेष्टा नहीं करते। हमारी प्रार्थना है कि आप उसके निवारणके लिये कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे सबकी सुरक्षा हो सके।' जब देवताओंने मुझसे इस प्रकार कहा, तब मैंने और्वके आश्रमपर तृतीय नेत्रकी दृष्टि डाल दी, अतः उनका वह आश्रम भस्म हो गया। हमलोग तो वहाँसे बाहर निकल गये; किंतु आश्रमके जलनेसे और्वको महान् दुःख तथा संताप हुआ। शिवे! वे क्रोधसे भर उठे हैं और अब उनके रोषयुक्त शापसे हमारे मनमें भी बड़ी व्यथा हो रही है।'

वसुंधरे! फिर महाभाग शम्भुने अशान्त होकर इधर-उधर भ्रमण करना आरम्भ किया; किंतु किसी क्षण वे शान्त न रह सके। मैं भी उनके आत्मा होनेसे उस समय उनके दुःखसे दुःखी और संतप्त होकर निश्चेष्ट-सा हो गया। इधर पार्वतीने भगवान् शंकरसे कहा—'अब हमलोग भगवान् नारायणके पास चलें। सम्भव है, उनकी वाणी और परामर्शसे हमें शान्ति मिल जाय। अथवा भगवान् नारायणको साथ ले फिर हम सभी और्वके पास चलें और उनसे प्रार्थना करें कि आपने जो शाप दिया है, उसे वापस कर लें; क्योंकि इससे हम सभी जल रहे हैं।'

देवि! फिर उस समय इस प्रकारके सभी प्रयत्न किये गये, किंतु और्वने उत्तर दिया—'मेरी बात कभी भी मिथ्या नहीं हो सकती। हाँ, मैं उपाय बतला सकता हूँ, सुरभि गायोंको लेकर आप लोग वहाँ जायँ और ये गौएँ अपने दूधसे रुद्रको स्नान करायें तो निश्चय ही इस शापसे आप सब छूट जायँगे, इसमें संदेह नहीं।'

कल्याणि! उस अवसरपर मैंने महान् शक्तिशालिनी सतहत्तर सुरभि गायोंको स्वर्गसे नीचे उतारा और उनके दूधसे सिक्त हो जानेपर रुद्र एवं अन्य सबोंकी जलन भी सदाके लिये शान्त हो गयी। तबसे उस स्थानका नाम 'गोनिष्क्रमण'-तीर्थ हो गया। जो मनुष्य वहाँ एक रात भी निवास एवं स्नान करता है, वह 'गोलोक' में जाकर आनन्दका उपभोग करता है। उत्तम धर्मके आचरण करनेके पश्चात् यदि उसकी वहाँ (गोनिष्क्रमण-तीर्थमें) मृत्यु होती है तो वह शङ्ख, चक्र एवं गदासे सम्पन्न होकर मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है।

यहाँ गौओंके मुखसे निकला हुआ एक अत्यन्त श्रुति-सुखद शब्द सुनायी पड़ता है। एक बार ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको मैंने स्वयं ऐसा सुसंस्कृत शब्द सुना था, अतः इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिये। ऐसा ही गोस्थलका नामका एक परम पवित्र क्षेत्र है। वहाँ मुझमें श्रद्धा रखनेवाले पवित्रात्मा पुरुषको शुभ कर्म करना चाहिये। उसके प्रभावसे वह पापोंसे यथाशीघ्र छूट जाता है। महाभागे! जिस समय शंकरको और्वमुनिका शाप लगा था और वे उससे जल रहे थे, तब वे मरुद्गणोंके साथ वहाँ गये तथा शापसे उनकी मुक्ति हो गयी, इसीसे इस क्षेत्रकी ऐसी महिमा है। यह 'गोस्थलका' नामवाला क्षेत्र परम श्रेष्ठ एवं सब प्रकारसे शान्ति प्रदान करनेवाला है।

महाभागे! यह प्रसङ्ग सम्पूर्ण मङ्गलोंको प्रदान करनेवाला और मेरे मार्गका अनुसरण करनेवाले भक्तोंमें श्रद्धाकी वृद्धि करनेवाला है। यह श्रेष्ठोंमें