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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४९

जाते हैं। इसके समीप ही 'धूतपाप' नामक तीर्थ है, जो मणिपूरगिरिके ऊपर है। वहाँ निवास करनेवाले प्राणीपर तबतक जलधारा नहीं गिरती, जबतक उसके सभी पाप समाप्त न हो जायें। यह बड़े आश्चर्यकी बात है। सुश्रोणि! सम्पूर्ण पापोंके नष्ट हो जानेपर ही प्राणीपर जलधारा वहाँ गिरती है। ऐसे ही वहाँ एक पीपलका वृक्ष भी है।

पृथ्वी बोली— 'भगवन्! आप ही 'स्तुतस्वामी' हैं, मैंने ऐसी बात सुनी है। अब इस 'स्तुतस्वामी' नामसे आपका अभिप्राय क्या है? इसे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! जब मैं 'मणिपूर' नामक स्थानपर था, उस समय मन्त्रोंके प्रवचन करनेवाले ब्रह्मा आदि बहुत-से देवतालोग मेरी स्तुति करने लगे। परम सौभाग्यवती देवि! इसी कारण नारद, असित, देवल तथा पर्वत नामवाले मुनिगणोंने भक्तिसे सम्पन्न होकर उस समय उस 'मणिपूर'-पर्वतपर मेरा नाम 'स्तुतस्वामी' रखा। तबसे मेरे सत्कर्मसे सम्बन्धित मेरा यह 'स्तुतस्वामी' नाम विख्यात हुआ। भद्रे! मैंने तुमसे अखिल धर्मोंको आश्रय देनेवाला यह 'श्रीस्तुतस्वामीका माहात्म्य' बतलाया। अब तुम दूसरा कौन प्रसङ्ग पूछना चाहती हो, यह बतलाओ। [अध्याय १४८]


द्वारका-माहात्म्य

पृथ्वी बोली— भगवन्! देवेश्वर! आपकी कृपासे 'स्तुतस्वामी' का माहात्म्य सुननेका सौभाग्य मिला है। कृपानिधे! अब इन स्तुतस्वामीके गुण एवं माहात्म्य मुझे सुनानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! द्वापरयुगमें यादवोंके कुलमें कुलोद्धारक 'शौरि-वसुदेव' नामसे मेरे पिता होंगे। उस समय विश्वकर्माद्वारा निर्मित दिव्य पुरी द्वारकामें मैं पाँच सौ वर्षोंतक निवास करूँगा। उन्हीं दिनों दुर्वासा नामसे विख्यात एक ऋषि होंगे, जो मेरे कुलको शाप दे देंगे। पृथ्वि! उन ऋषिके शापसे संतप्त होनेके कारण वृष्णि, अन्धक एवं भोज-कुलके सभी व्यक्तियोंका संहार हो जायगा। उसी समय जाम्बवती नामवाली मेरी एक प्रिय पत्नी होगी। वह मेरे सुखकी साधिका बनेगी। उससे एक महान् भाग्यशाली पुत्रका जन्म होगा। रूप एवं यौवनका गर्व करनेवाला मेरा वह परम सुन्दर पुत्र साम्ब नामसे विख्यात होगा, जो मुझे प्रिय होगा।

अब मैं वैष्णव पुरुषोंको सुख प्रदान करनेवाले द्वारकाके स्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। 'पञ्चसर' नामसे विख्यात मेरा एक गुह्य क्षेत्र है। समुद्रके तटसे कुछ दूर जाकर मेरे कर्ममें (भक्तिमें) संलग्न मानवको सुखी बनानेवाले उस क्षेत्रमें छः दिनोंतक निवासकर स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप स्नान करनेवाला मनुष्य अप्सराओंसे भरे हुए स्वर्गलोकमें आनन्दका उपभोग करता है। उस 'पञ्चसर' धाममें प्राण-त्याग करनेवाला मनुष्य मेरे लोक (वैकुण्ठ)-में प्रतिष्ठा पाता है। वहीं समुद्रमें मकरकी आकृतिवाला एक स्थान है, जहाँ अनेक मगरमच्छ इधर-उधर घूमते हुए दिखलायी पड़ते हैं, पर जलमें स्नान करनेवाले व्यक्तियोंके प्रति वे कुछ भी अपराध नहीं करते। मानव उस विमल जलमें जब पिण्डोंको फेंकते हैं तो उन्हें दूर रहनेपर भी वे झपटकर ले लेते हैं, परंतु बिना दिये वे उन्हें नहीं लेते। इसी प्रकार यदि कोई पापी मनुष्य जलमें पिण्ड देता है तो उसे वे नहीं लेते, किंतु धर्मात्मा पुरुषोंके फेंके हुए पिण्डोंको वे ग्रहण कर लेते हैं।