वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २९६ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १६१-१६२ |
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कहा—'मुझे भी आत्मयोगकी शक्ति सुलभ है, अतः उसके सहारे मैं अपने पुत्रके साथ वहाँ चल सकूँगा।' फिर तो उस सिद्ध पुरुषने अपने दाहिने हाथमें उस वेदज्ञ ब्राह्मणको तथा बायें हाथमें उसके परम बुद्धिमान् पुत्रको लेकर ऊपर उड़ा और 'कल्पग्राम' में पहुँच गया। वहाँ पहुँच जानेपर वे पिता-पुत्र अब 'कल्पग्राम' में ही रहने लगे। बहुत समय व्यतीत हो जानेपर उस ब्राह्मणके शरीरमें व्याधि उत्पन्न हो गयी, वृद्धावस्था तो थी ही, अतः मरनेका निश्चयकर उस धर्मात्मा ब्राह्मणने अपने सुयोग्य पुत्रको सामने बुलाया और कहा—'वत्स! मुझे गङ्गाके तटपर ले चलो।' पुत्रने उसे गङ्गाके किनारे पहुँचाया और वह भी अपने पिताके प्रति अपार श्रद्धा-भक्तिके कारण वहीं उसके पास रहने लगा।
भद्रे! एक दिनकी बात है, दैववश कान्यकुब्ज-देशके निवासी उस सिद्ध पुरुषके घर वह ब्राह्मणकुमार भोजनके लिये गया। उस सिद्धने ब्राह्मणकुमारका स्वागत-सत्कार किया और न्यायपूर्वक उसकी अर्चना करनेके पश्चात् उसके साथ अपनी कन्याका विवाह भी कर दिया। तबसे वह ब्राह्मणकुमार प्रतिदिन अपने श्वशुरके ही घर जाकर भोजन करने लगा। अपने पिताकी चिन्तनीय स्थिति देखकर उस ब्राह्मणकुमारने एक दिन अपने उस सिद्ध पुरुष श्वशुरसे पूछा—'स्वामिन्! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि पिताजीका यह कष्टजर्जरित शरीर कब शान्त होगा?' इसपर उस सिद्ध पुरुषने मुस्कुराकर कहा—'द्विजवर! तुम्हारे पिताने अपवित्र अन्न खाया था। इसी आहार-दोषने उन्हें इस दुर्गतिको पहुँचा दिया है। वह अन्न अभी इनके पैरोंमें पड़ा है।
लड़केने किसी दिन यह बात अपने पिताको बतला दी, अतः शरीरकी जर्जरतासे अत्यन्त दुःखी उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने एक दिन गङ्गातटपर पड़े एक पत्थरसे (अन्नदोषयुक्त) अपनी दोनों टाँगें तोड़ दीं, जिससे उसके प्राण निकल गये। उस समय उसका पुत्र अपने श्वशुरके गृह स्नान तथा भोजनादिके लिये गया हुआ था। लौटनेपर उसने जब अपने पिताका शव देखा तो विलाप करने लगा। आपस्तम्बमुनिने ठीक ही कहा है—'सर्पके काटनेसे, सींग एवं दाँतवाले जानवरोंके मारनेसे तथा सहसा अपने प्राणोंके त्यागनेसे अर्थात् आत्महत्या करनेसे जिसके प्राण जाते हैं, वह मनुष्य पापका भागी होता है।'
अब वह ब्राह्मणकुमार जब पुनः अपने श्वशुरके घर गया तो उसे देखते ही श्वशुरने कहा—'अरे! तुम्हें तो ब्रह्महत्या लगी है, तुम यहाँसे चले जाओ।' श्वशुरकी बात सुनकर जामाताने कहा—'महानुभाव! मैंने तो कभी किसी ब्राह्मणकी हत्या नहीं की, फिर आप मुझपर ब्रह्महत्याका दोषारोपण कैसे कर रहे हैं?' श्वशुरने उससे कहा—'पुत्रक! तुम अपने पिताकी ही मृत्युके हेतु बने हो, अतः तुम ब्रह्महत्याके भागी हुए हो। ऐसा नियम है कि 'यदि किसी पतितके साथ संनिकटमें एक वर्षतक शयन, भोजन अथवा वार्तालाप किया जाय तो शुद्ध पुरुष भी पतित हो जाता है। अतएव अब मेरे घरपर तुम्हारे रहनेके लिये कोई स्थान नहीं है।' श्वशुरकी यह बात सुनकर जामाताने कहा—'सुव्रत! जब आपने मेरा त्याग कर ही दिया तो अब मेरे लिये कौन-सा प्रायश्चित्त कर्तव्य है—यह बतानेकी कृपा कीजिये।' इसपर श्वशुर बोला—' 'अब तुम कल्पग्रामका त्यागकर 'मथुरा' जाओ। मथुराको छोड़कर तुम्हारी शुद्धि कहीं भी सम्भव नहीं है।' ' अब वह ब्राह्मण उसी क्षण 'कल्पग्राम' से चलकर 'मथुरा' आया और नगरके बाहर ही