वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३१२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १७२-१७३ |
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उनसे पूछा—'देवियो! संसारमें बगीचा लगानेवालेको क्या फल मिलता है तथा जो कुआँ तथा देवमन्दिरका निर्माण करता है, उसे कौन-सा पुण्यफल प्राप्त होता है? आप यह सब हमें बतानेकी कृपा करें।' इसपर वे बोलीं—'आर्य! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन द्विजाति वर्णोंके लिये धर्मका पहला साधन है—'इष्टापूर्त'का पालन करना। 'इष्ट'के प्रभावसे स्वर्ग मिलता है और 'पूर्त'से मोक्ष¹। जो पुरुष बिगड़ते हुए वापी, कुआँ, तालाब अथवा देवमन्दिरोंका जीर्णोद्धार कराता है, वह पूर्तके पुण्य-फलका भागी होता है। भूमि-दान और गोदान करनेसे पुरुषोंके लिये जो पुण्य बताया गया है, वैसा ही फल वृक्षोंके लगानेसे मानव प्राप्त कर लेते हैं। एक पीपल अथवा एक पिचुमन्द (निम्ब), एक बड़, दस फूलवाले वृक्ष, दो अनार, दो नारङ्गी और पाँच आम्रके वृक्षोंका जो आरोपण करता है, वह नरकमें नहीं जाता।² जिस प्रकार सुपुत्र कुलका उद्धार कर देता है तथा प्रयत्नपूर्वक नियमसे किया गया 'अतिकृच्छ्र' व्रत उद्धारक होता है, वैसे ही फलों और फूलोंसे सम्पन्न वृक्ष अपने स्वामीका नरकसे उद्धार कर देते हैं।'
**भगवान् वराह कहते हैं—**पृथ्वि! मालती प्रभृति पुष्प-जाति तथा वृक्षोंकी यज्ञाङ्ग-साधनभूता, फलप्रदाता छाया एवं गृहोपयोग आदिसे सम्बद्ध ज्येष्ठादेवीके साथ इस प्रकार वार्तालाप करनेके बाद गोकर्ण कहने लगा—'अहो! महान् दुःखकी बात है कि मैं अपने माता-पिताको भूल गया?' और उसे मूर्च्छा आ गयी। फिर उन देवियोंने गोकर्णके मुखपर जल छिड़के, जिससे उसकी चेतना लौटी। फिर देवियोंने उसे आश्वासन दिया और पूछा—आर्य! जहाँसे तुम आये हो, वहाँकी बातें बताओ।'
गोकर्णने कहा—'देवियो! मेरा निवास मथुरामें है, वहाँ मेरे वृद्ध माता-पिता और मेरी चार पतिव्रता पत्नियाँ भी हैं। वहाँ मेरा एक उद्यान और देवताका मन्दिर भी है।
इसपर ज्येष्ठादेवीने कहा—'अनघ! यदि तुम्हें मथुरा जानेकी उत्कट अभिलाषा है तो मैं तुम्हें वहाँ आज ही पहुँचा सकती हूँ। इससे हमें भी मथुरापुरीका दर्शन सुलभ हो जायगा। तुम इस सुन्दर विमानपर अभी बैठो और इन दिव्य रत्न, आभूषण तथा फलोंको भी साथ ले लो।' अब गोकर्ण विमानपर बैठा और भगवान् श्रीहरिको नमस्कार तथा देवियोंका अभिवादन कर मथुराके लिये प्रस्थित हुआ एवं वहाँ पहुँचकर उसने अयोध्याके राजाको वे रत्न, फल-फूल समर्पण किये। वहाँ गोकर्णको आया देखकर राजाके मनमें अपार आनन्द हुआ। उसने उसे अपने आसनपर ऐसे बैठाया, मानो किसी रत्नदाता धनी व्यक्तिको आसन दे रहा हो और बड़ा प्यार किया। अब गोकर्णने राजासे कहा—'थोड़ी देरके लिये आप इस स्थानसे बाहर चलें। अभी मैं एक आश्चर्यमय दृश्य दिखाऊँगा और आपसे कुछ निवेदन भी करूँगा।' इसका प्रबन्ध हो जानेपर वे सभी देवियाँ भी विमानसे वहाँ आ गयीं। सभी बात ज्ञात होनेपर राजाने अपनी सेना मथुरासे अयोध्या वापस कर और गोकर्णको बारंबार धन्यवाद देकर उसकी प्रशंसा कर उसे इच्छानुसार
१. देखिये पृष्ठ १८५ की टिप्पणी।
२. अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश पुष्पजाती:। द्वे द्वे तथा दाडिममातुलुङ्गे पञ्चाम्ररोपी नरकं न याति॥
(वराहपुराण ७२। ३९)-का यह श्लोक स्कन्दपुराण चातुर्मा० माहा० २०। ४९, भविष्यपु० पृ० ७९२ (वें०सं०), बृहत्पाराशरस्मृ० १०। ३७९ तथा पाद्मीय माघमाहात्म्य आदिमें भी प्राप्त होता है। वहाँ भी वृक्षारोपणका अतुलित माहात्म्य है।