वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३१४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १७४ |
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तीसरेके पास देनेकी शक्ति थी, किंतु जब कोई ब्राह्मण इससे याचना करने आता तो यह कहीं अन्यत्र ही चला जाता, अतः लोग इसे ‘शीघ्रग’ कहते हैं। चौथा माँगनेके डरसे ही अकेले सदा उद्विग्न होकर घरमें ही बैठा रहता था, अतः इसे ‘रोधक’ कहा जाता है। जो ब्राह्मणके याचना करनेपर मौन होकर सदा बैठ जाता और पृथ्वीपर रेखा खींचने लगता, वह हम सभीमें अधिक पापी है। उसका अनुगुण-नाम ‘लेखक’ पड़ा है। अभिमान करनेसे ‘लेखक’ तथा नीचे मुख करनेसे ‘रोधक’ की यह दशा हुई है। ‘शीघ्रग’ अब पङ्गुत्वका कष्ट भोगता है। ‘सूचीमुख’ इस समय उपवास करता है। उसकी गर्दन छोटी, ओठ लम्बे और पेट बहुत बड़ा है। पापसे ही हमारी ऐसी स्थिति है। विप्र! यदि तुम्हें हमारी इस स्थितिके अतिरिक्त अन्य भी कुछ सुननेकी इच्छा हो या पूछना चाहते हो तो पूछो ?
ब्राह्मणने कहा—‘प्रेतो ! पृथ्वीके सभी प्राणियोंका जीवन आहारपर ही अवलम्बित है। अतः मैं जानना चाहता हूँ कि तुम लोगोंके आहार क्या हैं?’
प्रेत बोले—‘दयालु ब्राह्मण! हमारे जो आहार हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो। वे आहार ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर तुम्हें अत्यन्त घृणा होगी। जिन घरोंमें सफाई नहीं होती, स्त्रियाँ जहाँ कहीं भी थूक-खखार देती हैं और मल-मूत्र यत्र-तत्र पड़ा रहता है, उन घरोंमें हम निवास एवं भोजन करते हैं। जहाँ पञ्चबलि नहीं होती, मन्त्र नहीं पढ़े जाते, दान-धर्म नहीं होता, गुरुजनोंकी पूजा नहीं होती, भाण्ड इधर-उधर बिखरे रहते हैं, जहाँ-कहीं भी जूठा अन्न पड़ा रहता है, प्रतिदिन परस्पर लड़ाई ठनी रहती है, ऐसे घरोंसे हम प्रेत भोजन प्राप्त करते हैं। विप्रवर! तुम तपस्याके महान् धनी पुरुष हो। हम तुमसे पूछना चाहते हैं, मनुष्यको ऐसा कौन-सा काम करना चाहिये, जिससे उसे प्रेत न होना पड़े, तुम उसे हमें बतानेकी कृपा करो।’
ब्राह्मण बोला—‘एकरात्र, त्रिरात्र, चान्द्रायण, कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र आदि व्रत करनेसे पवित्र हुए मनुष्यको प्रेतकी योनि नहीं मिलती। जो श्रद्धापूर्वक मिष्टान्न एवं जल दान करता है, जो संन्यासीका सम्मान करता है, वह प्रेत नहीं होता। पाँच, तीन अथवा एक वृक्षको भी जो नित्य जलसे पोसता है तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करता है, वह प्रेत नहीं होता। देवता, अतिथि, गुरु एवं पितरोंकी नित्य पूजा करनेवाला व्यक्ति भी प्रेत नहीं होता। क्रोधपर विजय रखनेवाला, परम उदार, सदा संतुष्ट, आसक्तिशून्य, क्षमाशील और दानी व्यक्ति प्रेत नहीं हो सकता। जो व्यक्ति शुक्ल तथा कृष्णपक्षकी एकादशीका व्रत करता है तथा सप्तमी एवं चतुर्दशी तिथियोंको उपवास करता है, वह भी प्रेत नहीं होता। गौ, ब्राह्मण, तीर्थ, पर्वत, नदियों तथा देवताओंको जो नित्य नमस्कार करता है, उसे प्रेतकी योनि नहीं मिलती। पर जो मनुष्य सदा पाखण्ड करता, मदिरा पीता है और चरित्रहीन तथा मांसाहारी है, उसे प्रेत होना पड़ता है। जो व्यक्ति दूसरेका धन हड़प लेता है तथा शुल्क (धन) लेकर कन्या बेचता है, वह प्रेत होता है। जो अपने निर्दोष माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री अथवा पुत्रका परित्याग कर देता है, वह भी प्रेत होता है। इसी प्रकार गो-ब्राह्मण-हत्यारे, कृतघ्न तथा भूमि और कन्यापहारी पापी व्यक्ति भी प्रेत होते हैं।’