वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९ ] भगवान्का मत्स्यावतार तथा उनकी देवताओंद्वारा स्तुति ३१
विराट् परमात्माकी हिरण्यगर्भके रूपमें उपासना करनेवालोंसे उन्होंने जनलोकको भर दिया और तपोनिष्ठ देवताओंसे तपोलोकको पूर्ण कर दिया। सत्यलोकको उन देवताओंसे परिपूर्ण किया, जो मरणधर्मा नहीं थे।
इस प्रकार भूतभावन भगवान् श्रीहरिने सृष्टिकी रचना सम्पन्न कर दी। परमेश्वरके संकल्पसे इस जगत्की रचना होनेके कारण ही सृष्टिको कल्प कहा जाता है। फिर भगवान् नारायण रात्रिकल्पके आनेपर निद्रामग्न हो गये। उनके सो जानेपर ये तीनों लोक भी प्रलयको प्राप्त हो गये। जब रात्रि समाप्त हो गयी, तब कमलनयन भगवान् श्रीहरि जाग उठे और उन्होंने पुनः चारों वेदों तथा उनकी स्वरूपभूता मातृकाओंका चिन्तन किया, किंतु योगनिद्राजनित अज्ञानसे मोहित हुए देवदेवेश्वर श्रीहरिको लोकमर्यादाओंको स्थिर करनेके लिये वेद उपलब्ध नहीं हुए। उन्होंने देखा—उनके ही आत्मस्वरूप वेद जलमें डूबे हुए हैं। अब उन्हें वेदोंके उद्धारकी चिन्ता हुई; अतएव तत्काल मत्स्यके रूपमें अवतरित होकर सागरकी विशाल जलराशिको क्षुब्ध करते हुए उसमें प्रविष्ट हो गये।
मत्स्यमूर्ति श्रीहरि महासिन्धुके अगाध जलसमूहमें प्रवेश करते ही महान् पर्वताकार रूपमें प्रकाशित हो उठे। इस प्रकार उन देवश्रेष्ठके मत्स्यावतार ग्रहण करनेपर देवता उत्तम स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे—'मत्स्यरूप धारण करनेवाले भगवान् नारायण! वेदोंके अतिरिक्त अन्य शास्त्रोंके पारगामी पुरुषोंके लिये भी आप अगम्य हैं, यह सारा विश्व आपका ही अङ्ग है। आप अत्यन्त मधुर स्वरमें वेदोंका गान करते हैं, विद्या और अविद्या दोनों आपके रूप हैं, आपको हमारा बारंबार नमस्कार है। आपके अनेक रूप हैं, चन्द्र और सूर्य आपके सुन्दर नेत्र हैं। प्रलयकालीन समुद्र जब सम्पूर्ण विश्वको आप्लावित कर लेता है, उस समय भी आप स्थित रहते हैं। विष्णो! आपको प्रणाम है। हमलोग आपकी शरणमें आये हैं, आप इस मत्स्य-शरीरका त्याग कर हमारी रक्षा करनेकी कृपा करें। अनन्त रूप धारण करनेवाले प्रभो! सारा संसार आपसे ही व्याप्त है। आपके अतिरिक्त इस जगत्में कुछ है ही नहीं और न इस जगत्के अतिरिक्त आप अव्यक्तमूर्तिकी कोई दूसरी मूर्ति ही है। इसीलिये हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। पुण्डरीकाक्ष! यह आकाश आप पुराणपुरुषका आत्मा है, चन्द्रमा आपके मन और अग्नि मुख हैं। देवाधिदेव शम्भो! यह सारा जगत् आपसे ही प्रकाशित है। यद्यपि हमलोग आपकी भक्तिसे रहित हैं, तो भी आप हमें क्षमा करनेकी कृपा करें। देवेश्वर! आप सम्पूर्ण जगत्के आश्रय हैं, आप सनातन पुरुषके मधुरभाषी सुन्दर स्वरयुक्त दिव्य रूपसे इस पर्वताकार विग्रहका कोई मेल ही नहीं है। अच्युत! आपके सूर्यसे भी अधिक तीव्र तेजसे हमलोग संतप्त हो रहे हैं, अतएव आप अपने इस रूपका संवरण कर लीजिये। भगवन्! हमलोग आपकी शरणमें आये हैं; क्योंकि आपको इस रूपसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करते देखकर हमारा मन भयभीत हो उठा है। आज आपको पूर्वरूपमें न पाकर आपसे हीन हुए हमलोगोंको ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे हमारे शरीरोंमें आत्मा ही न रह गया हो।' देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर मत्स्यरूपी भगवान् नारायणने जलमें निमग्न हुए उपनिषदों और शास्त्रोंसहित वेदोंका उद्धार कर दिया। इसके पश्चात् उन्होंने अपने नारायण-रूपमें स्थित होकर देवताओंको सान्त्वना प्रदान की। भगवान् नारायण जबतक सगुण-साकार रूपमें स्थित रहते हैं, तभीतक इस