वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३६२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १९८—२०० |
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गर्मी, भूख अथवा प्याससे भी क्लेश न हो।'
**ऋषिकुमार नचिकेता कहते हैं—**द्विजवरो! चित्रगुप्तकी आज्ञासे दूतोंके साथ जब मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि अनेक दूत बड़ी उतावलीके साथ इधर-उधर दौड़ रहे थे। वे किसीको पकड़ते तथा किन्हींपर प्रहार करते, पापियोंको बाँधते, आगमें जलाते तथा डंडोंसे बार-बार पीटते थे। कितनोंके सिर फूट गये थे और कई भयंकर चीत्कार कर रहे थे, पर वहाँ उनका कोई रक्षक न था। ऐसे ही बहुत-से प्राणी अन्धकारपूर्ण अगाध नरकमें पच रहे थे। कुछ प्राणी नरकोंमें पकाये जाते थे, जिनसे अग्निके लिये ईंधनका काम लिया जा रहा था। जो अधिक पापकर्मी थे, वे प्राणी खौलते हुए घृत, तेल एवं क्षार वस्तुवाले नरकमें गिरे थे। उनकी देह खौलते हुए घृत, तेल एवं क्षार पदार्थोंसे जलायी जा रही थी। भयंकर यातनाओंसे उनकी देह जल रही थी। अपने कर्मोंके अनुसार यत्र-तत्र विवश होकर वे रो रहे थे। कितने प्राणी तो तिलकी भाँति कोल्हूमें डालकर पेरे जा रहे थे। उन पापात्मा प्राणियोंके रुधिर, मेदादिसे एक दुस्तर वैतरणीनदी प्रकट हो गयी थी। उस भयंकर नदीमें फेनमिश्रित रुधिर भँवरें उठने लगीं। हजारों दूत ऐसे दृष्टिगोचर हुए, जो पापियोंको शूलकी नोकपर चढ़ाते और स्वयं वृक्षोंपर चढ़कर उन जीवोंको अत्यन्त भयंकर वैतरणीनदीमें फेंक देते थे। वह नदी अत्यन्त उष्ण रुधिरों तथा फेनोंसे भरी थी। उसमें अनेक सर्प थे, जो वहाँ पड़े हुए प्राणियोंको डँसा करते थे। उस नदीसे बाहर होना किसीके वशकी बात न थी। वे उस रुधिरमय जलमें डूबते और उतराते थे। उनके मुखसे वमन हो रहा था। उन्हें उनका कोई रक्षक नहीं मिलता।
वहाँ बहुत-से ऐसे प्राणी भी थे, जिन्हें दूतोंने 'कूटशाल्मलि' नामके वृक्षपर लटका दिया था। उस वृक्षमें लोहेके असंख्य काँटे थे। दूतोंद्वारा तलवारों और शक्तियोंसे बार-बार उनपर प्रहार हो रहा था। उस वृक्षकी शाखाएँ रोमाञ्चकारी थीं। उनपर लटके हुए हजारों पापी जीवोंको मैंने देखा है। कूष्माण्ड और यातुधान—ये यमराजके अनुचर हैं। इनकी आकृति बड़ी लम्बी है। इन्हें देखते ही प्राणी डर जाते हैं। तीखे काँटोंसे भरे हुए शाल्मलिवृक्षकी शाखाओंपर ये बड़ी शीघ्रतासे चढ़ते और निःशङ्क होकर पापी प्राणियोंके सुन्दर अङ्गोंपर प्रहार करने लगते थे। वे कूष्माण्ड-प्रभृति प्राणियोंको मारकर उनके मांस खानेमें तत्पर हो जाते। कारण, उनकी जाति भयंकर राक्षसकी है। पापियोंके मांस वे इस प्रकार खाने लगते थे, मानो बंदर वृक्षोंपर फल खा रहे हों। जैसे मनुष्य वनमें आम्रके पके फल खाता है, ठीक वैसे ही लम्बे मुखवाले एवं दुर्धर्ष वे कूष्माण्ड आदि राक्षस मुखमें लेकर उन प्राणियोंको अपने उदरमें पहुँचा देते थे। वे वृक्षपर ही उन पापी प्राणियोंको चूस लेते और जब केवल हड्डियाँ बच जाती थीं, तब उन जीवोंको जमीनपर फेंक देते थे। पृथ्वीपर पड़नेके पश्चात् वनवासी जानवर झट वहाँ आते और जो बचा-खुचा मज्जा-मांस रहता, उसे पुनः वे चूसने लगते थे। फिर भी अवशिष्ट कर्मोंका क्रम यथाशीघ्र चलता रहता था। वहाँ कभी पत्थरों और धूलोंकी वर्षा होती है, जिससे घबड़ाकर कितने पापात्मा प्राणी वृक्षके नीचे जाते हैं, पर वहाँ भी उनके शरीरमें आग लग जाती है। कोई जीव जोरसे भागनेका प्रयास करते हैं, किंतु दूत उन्हें सावधानीके साथ पकड़कर बाँध लेते हैं। भयंकर स्थानोंमें वे आगके द्वारा पचाये जाते हैं।