वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४ |
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ब्राह्मणोंकी आज्ञासे जल एवं यवसे देवताओंको अर्घ्य देना चाहिये। फिर श्राद्धविधिको जाननेवाला श्राद्धकर्ता विधिपूर्वक उत्तम चन्दन, धूप और दीप उन विश्वेदेव आदि देवताओंको अर्पण करे। पितरोंके निमित्त इन सभी उपचारोंका अपसव्य¹-भावसे निवेदन करे। फिर ब्राह्मणकी अनुमतिसे दो भाग किये हुए कुश पितरोंके लिये दे। विवेकी पुरुषको चाहिये, मन्त्रका उच्चारण करके पितरोंका आवाहन करे। अपसव्य होकर तिल और जलसे अर्घ्य देना उचित है।
श्राद्ध करते समय अतिथिके आ जानेपर कर्तव्यका विधान
मार्कण्डेयजी कहते हैं—द्विजवर! श्राद्ध करते समय यदि कोई भोजन करनेकी इच्छासे भूखा पथिक अतिथिरूपमें आ जाय तो ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर उसे भी यथेच्छ भोजन कराना चाहिये। अनेक अज्ञातस्वरूप योगिगण मनुष्योंका उपकार करनेके लिये नाना रूप धारणकर इस धराधामपर विचरण करते रहते हैं। इसलिये विज्ञ पुरुष श्राद्धके समय आये हुए अतिथिका सत्कार अवश्य करे। विप्रवर! यदि उस समय वह अतिथि सम्मानित नहीं हुआ तो श्राद्ध करनेसे प्राप्त होनेवाले फलको नष्ट कर देता है।
श्राद्धके समय हवन करनेकी विधि
(मार्कण्डेयजी कहते हैं)—पुरुषप्रवर! श्राद्धके अवसरपर ब्राह्मणको भोजन करानेके पहले उनसे आज्ञा पाकर शाक और लवणहीन अन्नसे अग्निमें तीन बार हवन करना चाहिये। उनमें 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे पहली आहुति, 'सोमाय पितृमते स्वाहा'—इससे दूसरी एवं 'वैवस्वताय स्वाहा' कहकर तीसरी आहुति देनेका समुचित विधान है। तत्पश्चात् हवन करनेसे बचे हुए अन्नको थोड़ा-थोड़ा सभी ब्राह्मणोंके पात्रोंमें दे।
श्राद्धमें भोजन करानेका नियम
भोजनके लिये उपस्थित अन्न अत्यन्त मधुर, भोजनकर्ताकी इच्छाके अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ हो। पात्रोंमें भोजन रखकर श्राद्धकर्ता अत्यन्त सुन्दर एवं मधुर वचन कहे—'महानुभावो! अब आप लोग अपनी इच्छाके अनुसार भोजन करें।' ब्राह्मणोंको भी तद्गतचित्त और मौन होकर प्रसन्नमुखसे सुखपूर्वक भोजन करना चाहिये। यजमानको क्रोध तथा उतावलेपनको छोड़कर भक्तिपूर्वक भोजन परोसते रहना चाहिये।
अभिश्रवण (वैदिक श्राद्धमन्त्रका पाठ)
श्राद्धमें ब्राह्मणोंके भोजन करते समय रक्षोघ्न मन्त्र²का पाठ करके भूमिपर तिल बिखेर दे तथा अपने पितृरूपमें उन द्विजश्रेष्ठोंका ही चिन्तन करे। साथ ही यह भी भावना करे—'इन ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आदि आज भोजनसे तृप्त हो जायँ।' भूमिपर पिण्ड देते समय प्रार्थना करे—'मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह इस पिण्डदानसे तृप्ति-लाभ करें। होमद्वारा सबल होकर मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आज तृप्ति-लाभ करें।' सबके बाद फिर प्रार्थना करनी चाहिये—'मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह—ये महानुभाव मैंने भक्तिपूर्वक उनके लिये जो कुछ किया या कहा है—उससे तृप्त होनेकी कृपा करें। मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह और विश्वेदेव तृप्त हो जायँ एवं
१. यज्ञोपवीतको दायें कंधेपर रखना।
२. रक्षोघ्न मन्त्र—यज्ञेश्वरो यज्ञसमस्तनेता भोक्ताऽव्ययात्मा हरिरीश्वरोऽत्र।
तत्संनिधानादपयान्तु सद्यो रक्षांस्यशेषाण्यसुराश्च सर्वे॥ (अ० १४।३२)