भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २४

या काटकर भी भस्म कर सकते थे। राजन्! उनका दंश शब्दकी ही तरह तीव्रगामी था। उससे भी मनुष्योंकी मृत्यु हो जाती। इस प्रकार प्रजाका प्रतिदिन दारुण संहार होने लगा। यों अपना भीषण संहार देखकर प्रजावर्ग एकत्र होकर सबको शरण देनेमें समर्थ परम प्रभु भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें गये। राजन्! इसी उद्देश्यको सामने रखकर प्रजाओंने कमलपर प्रकट होनेवाले ब्रह्माजीसे कहा—'भगवन्! आपमें असीम शक्ति है। इन तीखे दाँतोंवाले सर्पोंसे आप हमारी रक्षा करें। इनकी दृष्टि पड़ते ही मनुष्य तथा पशुसमूह भस्म हो जाते हैं—यह प्रतिदिनकी बात हो गयी है। भगवन्! इन सर्पोंद्वारा आपकी सृष्टिका संहार हो रहा है। महामते! आप इसकी जानकारी प्राप्तकर ऐसा प्रयत्न करें कि यह दुःखद परिस्थिति शीघ्र दूर हो जाय।'

ब्रह्माजी बोले—प्रजापालो! तुम भयसे घबड़ा गये हो। मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करूँगा। पर अब तुम सभी अपने-अपने स्थानपर चलो।

अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर वे प्रजाएँ वापस आ गयीं। उस समय ब्रह्माजीके मनमें असीम क्रोध उत्पन्न हो गया। उन्होंने वासुकि प्रभृति प्रमुख सर्पोंको बुलाया और उन्हें शाप दे दिया।

ब्रह्माजीने कहा—नागो! तुम मेरे द्वारा उत्पन्न किये हुए मनुष्योंकी मृत्युके कारण बन गये हो। अतः आगे स्वायम्भुव मन्वन्तरमें तुम्हारा अपनी ही माताके शापद्वारा घोर संहार होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

जब ब्रह्माजीने इस प्रकार उन श्रेष्ठ सर्पोंसे कहा तब सर्पोंके शरीरमें भयसे कँपकँपी मच गयी। वे उन प्रभुके पैरोंपर गिर पड़े और ये वचन कहे।

नाग बोले—भगवन्! आपने ही तो कुटिल जातिमें हमारा जन्म दिया है। विष उगलना, दुष्टता करना, किसी वस्तुको देखकर उसे नष्ट कर देना—यह हमारा अमिट स्वभाव आपके द्वारा ही निर्मित है। अब आप ही उसे शान्त करनेकी कृपा करें।

ब्रह्माजीने कहा—मैं मानता हूँ, तुम्हें मैंने उत्पन्न किया है और तुममें कुटिलता भी भर दी है, पर इसका अभिप्राय यह नहीं है कि तुम निर्दय होकर नित्य मनुष्योंको खाया करो।

सर्पोंने कहा—भगवन्! आप हमें अलग-अलग रहनेके लिये कोई सुनिश्चित स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये और हमारे द्वारा डँसे जानेकी स्थिति एवं नियम भी बता दें।

राजन्! नागोंकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा—सर्पो! तुमलोग मनुष्योंके साथ भी रह सको—इसके लिये मैं स्थानका निर्णय कर देता हूँ। तुम सबलोग मनको एकाग्रकर मेरी आज्ञा सुनो—'सुतल, वितल और पाताल—ये तीन लोक कहे गये हैं। तुम्हें रहनेकी इच्छा हो तो वहीं निवास करो। वहाँ मेरी आज्ञा तथा व्यवस्थासे अनेक प्रकारके भोग तुम्हें भोगनेके लिये प्राप्त होंगे। रातके सातवें पहरतक तुम्हें वहाँ रहना है। फिर वैवस्वत मन्वन्तरके आरम्भमें कश्यपजीके यहाँ तुम्हारा जन्म होगा। देवतालोग तुम्हारे बन्धु-बान्धव होंगे। बुद्धिमान् गरुडसे तुम्हारा भाईपनेका सम्बन्ध होगा। उस समय कारणवश तुम्हारी सारी संतान (जनमेजयके यज्ञमें) अग्निके द्वारा जलकर स्वाहा हो जायगी। इसमें निश्चय ही तुम्हारा कोई दोष न होगा। जो सर्प अत्यन्त दुष्ट और उच्छृङ्खल होंगे, उन्हींकी उस शापसे जीवनलीला समाप्त होगी। जो ऐसे न होंगे, वे जीवित रहेंगे। हाँ, अपकार करनेपर या जिनका काल ही आ गया