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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २६

आत्मविद्यारूपी अमृतका यह विषय अत्यन्त गुह्य है। भगवान् शंकरके अहंकारका यह मूर्तरूप है। सम्पूर्ण पापोंके प्रशमन करनेवाले स्वयं भगवान् शंकर ही स्कन्दरूपमें प्रकट हुए थे।

पितामह ब्रह्माजीने इनके अभिषेकके समय इन्हें षष्ठी तिथि प्रदान की थी। अतः जो व्यक्ति इस तिथिमें संयमपूर्वक केवल फलके आहारपर रहकर इनकी पूजा करता है, उसे यदि पुत्र न हो तो पुत्रकी प्राप्ति अथवा निर्धन हो तो धनकी प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, मनुष्य मनसे भी जिन-जिन वस्तुओंकी इच्छा करेगा, वह उसे सुलभ हो जायगी। जो पुरुष स्वामी कार्तिकेयके उपर्युक्त गुणनामपूर्ण स्तोत्रका पाठ करता है, उसके घरमें बच्चोंका सदा कल्याण होता है और वे नीरोग रहते हैं।

[ अध्याय २५]


सप्तमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें आदित्योंकी उत्पत्तिकी कथा

राजा प्रजापालने पूछा— ब्राह्मणश्रेष्ठ! दिव्य ज्योतिःपुञ्जका शरीर-धारण बड़े आश्चर्यकी बात है। कृपया मुझ शरणागतकी इस शङ्काका आप निराकरण करें।

मुनिवर महातपाजी कहने लगे— राजन्! विज्ञानात्मा, सनातन ज्ञानशक्तिको जब किसी दूसरी शक्तिकी अपेक्षा हुई तो उसके शरीरसे एक प्रकाशमान तेज निकल पड़ा, जो सूर्य कहलाया। यह उन महान् पुरुषका ही एक दूसरा रूप है। फिर उस मूर्तिमें सम्पूर्ण तेज स्थान पा गये। तब उससे तीनों लोकोंमें प्रकाश फैल गया। उस तेजमें अखिल महर्षियोंसहित सम्पूर्ण देवता और सिद्ध अधिष्ठित हैं। इसीलिये उन प्रभुको स्वयम्भू कहा जाता है। उन्हींसे सूर्यका प्राकट्य हुआ। वे ही स्वयं सूर्यरूपसे लक्षित हैं। उस विग्रहमें तुरंत तेजोंका समावेश हो गया। अतः वे परम तेजस्वी शरीरवाले बन गये। वेदवादी मुनिगण इसी तेजको सूर्य आदि नामोंसे व्यवहृत करते हैं। जब वे आकाशमें ऊपर उठकर सभी लोकोंको प्रकाशित करने लगे, तब उनका अनुगुण नाम 'भास्कर' पड़ गया। इसी प्रकार चारों ओर प्रकाश फैलानेके कारण इनकी 'प्रभाकर' नामसे भी प्रसिद्धि हुई। दिवा और दिवस—ये दोनों शब्द एक ही अर्थके बोधक हैं। इनके द्वारा दिवसका निर्माण हुआ, अतः ये दिवाकर कहलाये। सम्पूर्ण संसारके आदिमें ये विराजते थे, अतः इन्हें आदित्य कहते हैं। फिर इन्हीं भगवान् सूर्यके तेजसे भिन्न-भिन्न बारह आदित्य उत्पन्न हुए। वैसे प्रधानतया एक ही रूपमें ये जगत्में घूमते रहते हैं। जब इनके शरीरमें स्थान पाये हुए देवताओंने देखा कि ये ही परब्रह्म परमेश्वर जगत्में व्याप्त होकर तेज फैला रहे हैं, तब वे श्रीविग्रहसे बाहर निकल आये और भगवान्‌की इस प्रकार स्तुति करने लगे।

देवता बोले— भगवन्! आपसे जगत्‌की सृष्टि होती है। आपके द्वारा ही इस विश्वका पालन और संहार होता है। आप आकाशमें ऊँचे जाकर निरन्तर विश्वमें चक्कर लगाते हैं। ऐसे प्रभुकी हम सदा उपासना करते हैं। जगत्की रचना हो जानेपर प्रतापी सूर्यका रूप धारणकर आप सर्वत्र तेज भर देते हैं। जिसे सात घोड़े खींचते हैं, जिसकी कालरूपी धुरी है और जो बड़े वेगसे चलता है, ऐसा रथ आपकी सवारी है। प्रभो! आप प्रभाकर और रवि कहलाते हैं। चर और अचर—सम्पूर्ण संसारकी आत्मा आप ही हैं। सिद्ध पुरुष कहते हैं कि ब्रह्मा, वरुण, यम, भूत और भविष्य—सब कुछ आप ही हैं। भगवन्! वेद