भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २७

उद्यत देखकर रुद्र भी युद्धके लिये उद्यत हो गये। सभी देवता भी उनका साथ देनेको तैयार हुए। फिर उन प्रभुने वासुकि, तक्षक और धनञ्जयको स्मरण किया और उन्हें क्रमसे अपना कङ्कण और करधनी बनाया। इतनेमें नील नामसे प्रसिद्ध एक प्रधान दैत्य हाथीका रूप धारणकर भगवान् शंकरके पास आया। नन्दी उसकी माया जान गये और वीरभद्रको बतलाया। बस! क्या था, वीरभद्रने भी सिंहका रूप धारणकर उसे तत्काल मार डाला। उस हाथीका चर्म अञ्जनके समान काला था। वीरभद्रने उसकी चमड़ी उधेड़कर उसे भगवान् शंकरको समर्पित कर दिया। तब रुद्रने उसे वस्त्रके स्थानपर पहन लिया। तभीसे वे गजाजिनधारी हुए। इस प्रकार गजचर्म पहनकर उन्होंने श्वेत सर्पका भूषण भी धारण कर लिया। फिर हाथमें त्रिशूल लेकर अपने गणोंके साथ उन्होंने अन्धकासुरपर धावा बोल दिया। अब देवता एवं दानवोंमें भीषण संग्राम प्रारम्भ हो गया। उस अवसरपर इन्द्र आदि सभी लोकपाल, सेनापति स्कन्द एवं अन्य सभी देवता भी समराङ्गणमें उतर आये। यह स्थिति देखकर नारदजी तुरंत भगवान् नारायणके पास गये और बोले—‘भगवन्! कैलासपर देवताओंका दानवोंके साथ घोर युद्ध हो रहा है।’

यह सुनना था कि भगवान् जनार्दन भी हाथमें चक्र लेकर गरुडपर बैठे और युद्ध-स्थलमें पहुँचकर दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। उनके वहाँ आ जानेपर देवताओंका उत्साह कुछ बढ़ा अवश्य, किंतु उस समरमें उनका मन एक प्रकारसे म्लान हो चुका था, अतः वे सभी भाग चले। जब देवताओंकी शक्ति समाप्त हो गयी तो स्वयं भगवान् रुद्र अन्धकासुरके सामने गये। उसके साथ उनका रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हो गया। उस समय उन प्रभुने उस दानवपर त्रिशूलसे भीषण प्रहार किया। फिर तो घायल हो जानेपर अन्धकासुरके शरीरसे जो रक्त जमीनपर गिरा, उससे उसी क्षण दूसरे असंख्य अन्धकासुर उत्पन्न हो गये। युद्धभूमिमें ऐसा अत्यन्त आश्चर्यपूर्ण दृश्य देखकर परम प्रभु भगवान् रुद्रने प्रधान अन्धकासुरको त्रिशूलके अग्रभागसे बींध दिया और उसे लिये हुए नाचने लगे। शेष मायामय अन्धकासुरोंको भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे काट डाला। शूल-प्रोत प्रधान अन्धकासुरके शरीरसे रक्तकी धाराएँ अब भी निरन्तर प्रवाहित हो रही थीं; अतः रुद्रके मनमें भीषण क्रोधाग्नि भड़क उठी, जिससे उनके मुखसे अग्निकी ज्वाला बाहर निकलने लगी। उस ज्वालाने एक देवीका रूप धारण कर लिया, जिसे लोग योगेश्वरी कहने लगे।

इसी प्रकार भगवान् विष्णुने भी अपने रूपके सदृश (ज्वालाद्वारा) अन्य शक्तिका निर्माण किया। ऐसे ही ब्रह्मा, कार्तिकेय, इन्द्र, यम, वराह, महादेव, विष्णु और नारायण—इनके प्रभावसे आठ मातृकाएँ प्रकट हो गयीं। जब श्रीहरिने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये वराहका रूप धारण किया था, उस समय जिन्हें अपनाया वे वाराही हैं। इस प्रकार ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, यमी, योगेश्वरी, माहेश्वरी और माहेन्द्री—ये आठ मातृकाएँ हैं। क्षेत्रज्ञ श्रीहरिने जिनका जिस कारणसे निर्माण हुआ था, उसपर विचार करके उनका वही नाम रख दिया। ऐसे ही काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मात्सर्य, पैशुन्य और असूया—इनकी आठ शक्तियाँ मातृका नामसे प्रसिद्ध हुईं। काम ‘योगेश्वरी’, क्रोध ‘माहेश्वरी’, लोभ ‘वैष्णवी’, मद ‘ब्रह्माणी’, मोह ‘कौमारी’, मात्सर्य ‘इन्द्राणी’, पैशुन्य ‘यमदण्डधरा’ और असूया ‘वाराही’ नामसे कही गयी हैं—ऐसा जानना चाहिये। ये कामादिगण

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