वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २८
सीमा न थी। धीरे-धीरे वह प्राग्ज्योतिषपुर (कामरूप—आसाम)-का नरेश बन गया और युवा होनेपर तो उसके बल-विक्रम बहुत बढ़ गये। उसने अब महायोगशक्तिद्वारा सात द्वीपोंवाली इस सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लिया। बादमें कालकेयोंको जीतनेके लिये उसने मेरु-पर्वतपर चढ़ाई की। जब वह असुर इन्द्रके पास गया तो वे भयसे वहाँसे भाग चले। अग्निने तो उसे देखते ही अपना स्थान छोड़ दिया। ऐसे ही यम, निर्ऋति और वरुण—ये सब-के-सब उसके आनेपर अपने स्थानसे हटते गये। अन्तमें इन्द्र-प्रभृतिको साथ लेकर वरुणदेवता वायुदेवताके संनिकट गये। फिर पवनदेव भी इन्द्र आदि समस्त देवताओंके सहित धनाध्यक्ष कुबेरके पास पहुँचे। शंकरजी कुबेरके मित्र हैं; अतः धनाध्यक्ष कुबेर देवताओंको साथ लेकर शंकरजीके पास पधारे। राजन्! इतनेमें बलाभिमानी वेत्रासुर भी गदा लिये हुए कैलासपर जा पहुँचा। इधर भगवान् शिव उसे अवध्य समझकर देवताओंके साथ ब्रह्मलोक पहुँचे थे। वहाँ पुण्यकर्म करनेवाले बहुत-से देवता और सिद्धोंका समाज उनकी स्तुति कर रहा था। उस समय जगत्की रचना करनेमें कुशल ब्रह्माजी भगवान् विष्णुके चरणसे प्रकट हुई गङ्गाके पावन जलमें प्रविष्ट होकर क्षेत्रज्ञ परमात्माकी माया गायत्रीका नियमपूर्वक जप कर रहे थे। अब देवता बड़े जोरसे चिल्लाकर कहने लगे—'प्रजाओंकी रक्षा करनेवाले भगवन्! हमें बचाइये। वेत्रासुरसे हम समस्त देवता और ऋषि अत्यन्त भयभीत हो गये हैं। आप हमारी रक्षा करें! रक्षा करें!'
देवताओंके इस प्रकार पुकार मचानेपर ब्रह्माजीकी दृष्टि वहाँ आये हुए उन देवताओंकी ओर गयी। वे सोचने लगे—'अहो! भगवान् नारायणकी माया बड़ी विचित्र है। इस विश्वका कोई भी स्थान उससे रिक्त नहीं है। असुरों और राक्षसोंसे भला मेरा क्या सम्बन्ध?' वे इस प्रकार अभी चिन्तन कर ही रहे थे कि तबतक वहाँ एक अयोनिजा कन्या प्रकट हो गयी। उसका शरीर श्वेतवस्त्रोंसे सुशोभित हो रहा था। उसके गलेमें माला तथा मस्तकपर किरीट उद्भासित हो रहा था। उसकी कान्ति अत्यन्त उज्ज्वल थी तथा उसकी आठ भुजाएँ थीं, जिनमें क्रमसे शङ्ख, चक्र, गदा, पाश (शक्ति), तलवार, घण्टा और धनुष—ये दिव्य आयुध सुशोभित हो रहे थे। वह देवी तूणीर आदि अन्य सभी युद्धोपकरणोंसे भी सुसज्जित होकर जलसे बाहर निकल पड़ी। वह महायोगेश्वरी परब्रह्म परमात्माकी शक्ति सिंहपर समासीन थी। अब सहसा वह अनेक रूप धारणकर सभी असुरोंके साथ युद्ध करने लगी। उस देवीमें अपार शक्ति थी। उसके पास बहुत-से दिव्य अस्त्र थे। इस प्रकार देवताओंके वर्षसे यह युद्ध एक हजार वर्षोंतक चलता रहा और अन्तमें इस संग्राममें देवीद्वारा भयंकर वेत्रासुर मार डाला गया। अब देवताओंकी सेनामें बड़े जोरसे आनन्दकी ध्वनि होने लगी। उस दैत्यकी मृत्यु हो जानेपर सभी देवता युद्धभूमिमें ही—'भगवती! आपकी जय हो! जय हो!' कहकर स्तुति-प्रणाम करने लगे। साथ ही भगवान् शंकरने उनकी इस प्रकार स्तुति की—
भगवान् शंकर बोले—महामाये! महाप्रभे! गायत्री देवि! आपकी जय हो! महाभागे! आपके सौभाग्य, बल, आनन्द—सभी असीम हैं। दिव्य गन्ध एवं अनुलेपन आपके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। परमानन्दमयी देवि! दिव्य मालाएँ एवं गन्ध आपके श्रीविग्रहकी छवि बढ़ाती हैं। महेश्वरि! आप वेदोंकी माता हैं। आप ही वर्णोंकी मातृका हैं। आप तीनों लोकोंमें व्याप्त हैं। तीनों अग्नियोंमें