भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 85
७४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ३०

दशमी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें दिशाओंकी उत्पत्तिकी कथा

मुनिवर महातपा कहते हैं— राजन्! अब जिस प्रकार भगवान् श्रीहरिके कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुईं, वह कथा मैं कहता हूँ, तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो। आदिसर्गके आरम्भमें ब्रह्माजीको सृष्टि करते हुए यह चिन्ता हुई कि 'मेरी उत्पन्न प्रजाका आधार क्या होगा?' अतः उन्होंने संकल्प किया कि 'अब आभ्यन्तर-स्थान उत्पन्न हों।' उनके इस प्रकार विचार करते ही उन परम प्रभुके कानोंसे दस तेजस्वी कन्याओंका प्रादुर्भाव हुआ। राजन्! उनमें वे पूर्वा, दक्षिणा, पश्चिमा, उत्तरा, ऊर्ध्वा और अधरा—ये छः कन्याएँ तो मुख्य मानी गयीं। साथ ही उन कन्याओंके मध्यमें और चार कन्याएँ, जो परम सुन्दर रूपवाली गम्भीर भावोंवाली तथा महा-भाग्यशालिनी थीं, उत्पन्न हुईं। उस समय उन सभी कन्याओंने बड़ी नम्रताके साथ शुद्धस्वरूप ब्रह्माजीसे प्रार्थना की—'देवेश्वर! आप प्रजाके पालक हैं। हमें स्थान देनेकी कृपा कीजिये। स्थान ऐसा चाहिये, जहाँ हम सभी अपने पतियोंके साथ सुखपूर्वक निवास कर सकें। अव्यक्तजन्मा प्रभो! हमें आप महान् भाग्यशाली पति प्रदान करनेकी कृपा करें।'

ब्रह्माजी बोले— कमनीय कटिभागसे शोभा पानेवाली दिशाओ! यह ब्रह्माण्ड सौ करोड़का विस्तारवाला है। इसके अन्तर्गत तुम संतुष्ट होकर यथेष्ट स्थानोंपर निवास करो। मैं शीघ्र ही तुम्हारे अनुरूप सुन्दर एवं नवयुवक पतियोंका भी निर्माण करके देता हूँ। तदनन्तर इच्छानुसार तुम सभी अपने-अपने स्थानपर चली जाओ।

राजन्! जब ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा तो वे सभी कन्याएँ इच्छित स्थानोंको चल पड़ीं। फिर उन प्रभुने उसी क्षण महान् पराक्रमी लोकपालोंकी रचनाकर एक बार उन कन्याओंको पुनः अपने पास वापस बुलाया। उनके आ जानेपर लोकपितामह ब्रह्माजीने उन कन्याओंका उन लोकपालोंके साथ विवाह कर दिया। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजन्! उस अवसरपर उन परम प्रभुने पूर्वा नामवाली कन्याका विवाह इन्द्रके साथ, आग्नेयीदिक्का अग्निदेवके साथ, दक्षिणाका यमके साथ, नैर्ऋतीका निर्ऋतिके साथ, पश्चिमाका वरुणके साथ, वायव्यीदिक्का वायुके साथ, उत्तराका कुबेरके साथ तथा ईशानीदिक्का भगवान् शंकरके साथ विवाहका प्रबन्ध कर दिया। ऊर्ध्व दिशाके अधिष्ठाता वे स्वयं बने और अधोलोककी अध्यक्षता उन्होंने शेषनागको दी। इस प्रकार उन दिशाओंको पति प्रदान करनेके बाद ब्रह्माजीने उनके लिये दशमी तिथि निर्धारित कर दी। वही तिथि उन्हें अत्यन्त प्रिय बन गयी। राजन्! जो उत्तम व्रतका पालक पुरुष दशमी तिथिके दिन केवल दही खाकर व्रत करता है, उसके पापका नाश करनेके लिये वे देवियाँ सदा तत्पर रहती हैं। जो मनुष्य मनको वशमें करके दिशाओंके जन्मादिसे सम्बन्ध रखनेवाले इस प्रसङ्गको सुनता है, वह इस लोकमें प्रतिष्ठा पाता है और अन्तमें ब्रह्माजीका लोक प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं। [ अध्याय २९ ]


एकादशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें कुबेरकी उत्पत्ति-कथा

मुनिवर महातपा कहते हैं— राजन्! अब एक दूसरी कथा कहता हूँ। इसमें धनके स्वामी कुबेरकी उत्पत्तिका वर्णन है। यह प्रसङ्ग पापका नाश करनेवाला है। पहले कुबेरजी वायुके रूपमें अमूर्त ही थे। पश्चात् वे मूर्तिमान् बनकर उपस्थित हुए। परब्रह्म परमात्माका जो शरीर है, उसीके अन्तर्गत