भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ३२

कोई अन्यथा विचार नहीं है।'

इस प्रकार वर देकर भगवान् नारायण अपने प्राकृत रूपमें स्थित हो गये। फिर अब विष्णुको भी पहलेकी बात ध्यानमें आ गयी। सोचा—'अरे! मैं तो वही शक्तिसम्पन्न पुरुष हूँ।' तब उन महान् तपस्वी प्रभुने ऐश्वर्यके प्रभावसे योगनिद्राका स्मरण किया। वे देवी आ गयीं। स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली प्रजाओंका भार उनपर सौंप दिया। 'मैं उन परम प्रभु भगवान् नारायणका ही तो रूप हूँ'—ऐसा विचारकर वे फिर सो गये। सो जानेपर उनकी नाभिसे एक बड़ा-सा कमल निकला। सात द्वीपोंवाली पृथ्वी, समुद्र और वन—ये सब-के-सब उस कमलपर विराजमान थे। उस कमलके रूपका विस्तार आकाशसे पातालतक फैला था। उसकी कर्णिकापर सुमेरु-पर्वत सुशोभित हो रहा था। सबके बीचमें ब्रह्माजी थे। अपने ऐसे वैराज रूपको प्रत्यक्ष देखकर परम पुरुष परमात्माको बड़ा हर्ष हुआ। फिर उनके भीतर जो पवनदेव थे, उन्होंने व्यवहारके लिये वायुका सृजन किया। साथ ही कहा—'तुम अज्ञानपर विजय करनेवाले ज्ञानस्वरूप इस शङ्खका रूप धारण करो।' फिर श्रीहरिसे कहा—'अज्ञानका नाश करनेके लिये तुम्हारे हाथमें यह तलवार सदा शोभा पाती रहे। अच्युत! भयंकर काल-चक्रको काटनेके लिये यह चक्र धारण कर लो। केशव! पापराशि नष्ट हो जाय, एतदर्थ यह गदा धारण करना आवश्यक है। समस्त भूतोंको उत्पन्न करनेवाली यह वैजयन्ती माला तुम्हारे कण्ठमें सदा सुशोभित होती रहे। चन्द्रमा और सूर्य—ये दोनों श्रीवत्स और कौस्तुभके स्थानपर शोभा पायें। पवन चलनेमें सबसे पराक्रमी कहा गया है। वह तुम्हारे लिये गरुड बन जाय। तीनों लोकोंमें विचरनेवाली देवी लक्ष्मी सदा आपकी आश्रिता रहें। आपकी तिथि द्वादशी हो और आप अपने अभीष्टरूपसे विराजें। इस द्वादशी तिथिके दिन स्त्री अथवा पुरुष—जो कोई भी आपके प्रति श्रद्धा रखते हुए घृतके आहारपर रहे, वह स्वर्गमें स्थान पानेका अधिकारी हो जाय।'

(मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्!) वही परम पुरुष भगवान् नारायण 'विष्णु' इस नामसे विख्यात हुए। देवता और दानव—ये सब उन्हींकी मूर्तियाँ हैं। स्वयं वे ही अपने-आप विभिन्न रूप धारण करते हैं। उनके द्वारा किसीका संहार होता है तो किसीकी रक्षा होती है। उन्हें 'वेदान्तपुरुष' कहा जाता है। वे ही प्रभु प्रत्येक युगमें सब जगह विचरते हैं। जो उन्हें मनुष्य मानता है, उसे बुद्धिहीन समझना चाहिये। पापोंका नाश करनेवाला यह प्रसङ्ग वैष्णव-सर्ग कहलाता है। जो इसका पठन करता है, वह स्वर्गलोकमें जाकर परम पूज्य बन जाता है। [अध्याय ३१]


त्रयोदशी तिथि एवं धर्मकी उत्पत्तिका वर्णन

महातपाजी कहते हैं— राजन्! धर्म बड़े आदरके पात्र हैं। नरेन्द्र! उनकी उत्पत्ति, महिमा और तिथिका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो। जिन्हें परब्रह्म परमात्मा कहते हैं तथा जिन शुद्धस्वरूप प्रभुकी सत्ता सदा बनी रहती है, पहले केवल वे ही थे। उनके मनमें प्रजाओंकी रचना करनेका विचार उत्पन्न हुआ। फिर उन प्रजाओंकी रक्षाका उपाय सोचने लगे। वे इस चिन्तामें लगे ही थे कि इतनेमें उनके दक्षिण अङ्गसे एक पुरुष प्रकट हो गया। उसके कानोंमें श्वेत कुण्डल, गलेमें श्वेत माला थी और वह सफेद रङ्गका अनुलेपन लगाये हुए था। उसके चार पैर थे तथा उसकी आकृति