वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ३३ |
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देवताओंने कहा— जगत्की रक्षा करनेवाले महाभाग ! तुम्हारा वर्ण चन्द्रमाके समान उज्ज्वल है। तुम्हें बार-बार नमस्कार है। देवरूप धारण करनेवाले प्रभो ! तुम्हारी कृपासे स्वर्गका मार्ग दीख जाता है। तुम कर्ममार्गके स्वरूप हो तथा सब जगह विराजते हो। तुम्हें बार-बार नमस्कार है। पृथ्वीके पालक तथा तीनों लोकोंके रक्षक एकमात्र तुम्हीं हो। जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक सभी तुमसे सुरक्षित रहते हैं। स्थावर एवं जङ्गम—कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जो तुम्हारे बिना स्थित रह सके। तुम्हारे अभावमें तो यह जगत् तुरंत ही नष्ट हो सकता है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा हो। सज्जन पुरुषोंके हृदयमें सत्त्वस्वरूप धारणकर तुम शोभा पाते हो। राजस पुरुषोंमें राजस और तामस पुरुषोंमें तामसरूप तुम्हारा ही है। तुम्हारे चार चरण हैं। चारों वेद तुम्हारे सींग हैं। तीन नेत्र तुम्हारी शोभा बढ़ाते हैं। हाथोंकी संख्या सात है। तुम तीन बन्धवाले हो। ऐसे वृषभरूपी प्रभो ! तुम्हें नमस्कार है।* देव ! तुम्हारी अनुपस्थितिमें हम विपथगामी एवं मूर्ख बन गये हैं। तुम हमारे परम आश्रय हो। अतः हमें सन्मार्ग बतानेकी कृपा करो।
जब इस प्रकार देवताओंने स्तुति की तो प्रजापालक धर्म, जो वृषभके रूपसे पधारे थे, संतुष्ट हो गये। उनका मन प्रसन्न हो गया। फिर तो उनके शान्तस्वरूप नेत्रने ही उन्हें सन्मार्ग बता दिया। उनकी केवल दृष्टि पड़नेसे ही वे देवता धार्मिक नेत्रसे देखने लगे। एक क्षणमें ही उनका अज्ञान नष्ट हो गया। वे सम्यक् प्रकारसे सद्धर्म-सम्पन्न हो गये। असुरोंकी स्थिति भी वैसी ही हो गयी। तब ब्रह्माजीने धर्मसे कहा—'धर्म ! आजसे तुम्हारे लिये त्रयोदशी तिथि निश्चित कर देता हूँ। जो पुरुष इस तिथिके दिन उपवास करके तुम्हारी पूजा करेगा, वह पापी होनेपर भी पापमुक्त हो जायगा। धर्म ! तुममें प्रभूत सामर्थ्य है। तुम इस अरण्यमें बहुत समयतक निवास कर चुके हो, इसलिये यह वन 'धर्मारण्य' नामसे विख्यात होगा। प्रभो ! चार, तीन, दो और एक चरणसे युक्त होकर तुम कृत, त्रेता आदि युगमें जिस प्रकार लक्षित होते हो, उसी प्रकार पृथ्वी और आकाशमें रहकर विश्वको अपना घर मानते हुए उसकी रक्षा करो।'
राजन् ! इतनी बातें कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी देवताओं और दानवोंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। देवताओंका शोक दूर हो गया। वे वृषभका वेष धारण करनेवाले धर्मके साथ अपने लोकको चले गये। जो पुरुष त्रयोदशीके दिन श्राद्ध करते समय धर्मकी उत्पत्तिका यह प्रसङ्ग पितरोंको सुनायेगा एवं भक्तिके साथ दूधसे तर्पण करेगा, वह स्वर्गमें जाकर देवताओंके साथ सुखपूर्वक निवास करनेका अधिकारी होगा।
[अध्याय ३२]
चतुर्दशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें रुद्रकी उत्पत्तिका वर्णन
महातपा मुनि कहते हैं— राजन् ! इसके अतिरिक्त सृष्टिके आरम्भमें रुद्रके उत्पन्न होनेकी एक कथा और है। अब वह प्रसङ्ग कहता हूँ, यत्नपूर्वक सुनो—
जब तपोरूप धर्ममय वृक्ष नष्टप्राय हो गया था, उस समय प्रचण्ड तेजस्वी ब्रह्माजी क्षमारूपी अस्त्र धारण किये प्रकट हुए। उन परम प्रतापी प्रभुके आनेका प्रयोजन था परम ज्ञान और
* 'चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यान् आ विवेश।' (ऋग्वेद ४।५८।३) इस वेदमन्त्रमें भी यही भाव व्यक्त हुआ है।