भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92

अध्याय ३५ ] पूर्णिमा तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके स्वामी चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन ८१

भगवान् रुद्रने पूषाके दाँत तथा भगके नेत्र पूर्ववत् कर दिये। फिर सभीको यज्ञकी समाप्तिका फल भी प्रदान किया तथा देवताओंके अन्तःकरणमें परम विशुद्ध सम्पूर्ण ज्ञान भर दिया। इस प्रकार परब्रह्म परमात्माने पूर्वकालमें रुद्रको प्रकट किया था। इसी कार्यका सम्पादन करनेसे वे देवताओंके अधिष्ठाता कहलाते हैं।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन इस कथाका श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर भगवान् रुद्रके लोकको प्राप्त करता है। [अध्याय ३३]


अमावास्या तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी उत्पत्तिका कथन

महातपाजी कहते हैं—राजन्! अब मैं पितरोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। पूर्व समयकी बात है—प्रजापति ब्रह्माजी अनेक प्रकारकी प्रजाओंका सृजन करनेके विचारसे मनको एकाग्र करके बैठ गये। फिर उनके मनसे तन्मात्राएँ* बाहर निकलीं। उन्होंने उन सबको प्रधानता दी और 'इनको किन रूपोंसे सुशोभित करें'—यों विचारने लगे। कारण, वे सभी ब्रह्माजीके शरीरमें पहलेसे ही थीं और वहींसे पुनः ये धूम्रवर्णवाली तन्मात्राएँ प्रकट हुई थीं। फिर वे चमककर देवताओंसे कहने लगीं—'हम सोमरस पीना चाहती हैं।' साथ ही उनके मनमें ऊपरके लोकमें जानेकी इच्छा हुई। उन सबोंने सोचा—'हम आकाशमें आसन जमाकर वहीं तपस्या करें।' ऊपर जानेके लिये वे मुख उठाकर तिरछे मार्गका अवलम्बन करना ही चाहती थीं, इतनेमें उन्हें देखकर ब्रह्माजीने कहा—'समस्त गृहाश्रमियोंका कल्याण करनेके लिये आपलोग पितर होकर रहें।' ये जो ऊपर मुख करके जाना चाहते हैं, इनका नाम 'नान्दीमुख' होगा। इस प्रकार कहकर ब्रह्माजीने उनके मार्गका भी निरूपण कर दिया। राजन्! उस समय ब्रह्माजीने उन पितरोंके लिये मार्ग सूर्यका दक्षिणायनकाल बता दिया। इस प्रकार प्रजाकी सृष्टि कर वे जब मौन हो गये, तब पितरोंने उनसे कहा—'भगवन्! हमें जीविका देनेकी कृपा कीजिये, जिससे सुख प्राप्त कर सकें।'

ब्रह्माजी बोले—तुम्हारे लिये अमावास्याकी तिथि ही दिन हो। उस तिथिमें मनुष्य जल,तिल और कुशसे तुम्हारा तर्पण करेंगे। इससे तुम परम तृप्त हो जाओगे। इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। उस अमावास्या तिथिमें तिल देनेका विधान है। पितरोंके प्रति श्रद्धा रखनेवाला जो पुरुष तुम्हारी उपासना करेगा, उसपर अत्यन्त संतुष्ट होकर यथाशीघ्र वर देना तुम्हारा परम कर्तव्य है। [अध्याय ३४]


पूर्णिमा तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके स्वामी चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन

महातपाजी कहते हैं—राजन्! यशस्वी अत्रि मुनि ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उन्हींके यहाँ पुत्ररूपसे चन्द्रमाका प्राकट्य हुआ था। दक्षप्रजापतिने उन्हें अपना जामाता बना लिया। दक्षकी जो सत्ताईस दाक्षायणी कन्याएँ कही गयी हैं, वे सभी परम माननीया कन्याएँ चन्द्रमाकी पत्नी हुईं। उन कन्याओंमें रोहिणी सबसे श्रेष्ठ थीं। सुनते हैं, चन्द्रमा अकेली उस रोहिणीसे ही अधिक प्रेम करते थे, दूसरी अन्य कन्याओंसे नहीं। तब अन्य सभी कन्याएँ पिता दक्षके पास आयीं और


* पञ्चज्ञानेन्द्रियोंके विषय शब्द-स्पर्शादि ही तन्मात्राएँ हैं। (इनका प्रयोग संस्कृतमें क्लीब एवं पुल्लिंगमें दृष्ट है।)