भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

अध्याय ३६ ] प्राचीन इतिहासका वर्णन [ ८३

प्राचीन इतिहासका वर्णन

महातपा कहते हैं— राजन्! त्रेतायुगके आदिमें जो वीर मणिसे उत्पन्न हुए थे तथा जिनमेंसे एक तुम भी हो, अब उनका वृत्तान्त बताता हूँ, सुनो। नरेन्द्र! सत्ययुगमें जिसका नाम सुप्रभ था, वह तुम ही हो। यहाँ 'प्रजापाल'के नामसे भी तुम्हारी प्रसिद्धि हुई है। राजन्! शेष महाबली नरेश त्रेतायुगमें होंगे। जो दीप्ततेजा था, उसका नाम शान्त कहा गया है। सुरश्मि महाबली राजा शशकर्णके नामसे ख्याति प्राप्त करेगा। शुभदर्शन ही पाञ्चाल राजा होगा—इसमें संदेह नहीं है। सुशान्ति अङ्गवंशमें जन्म लेकर सुन्दर नामसे विख्यात होगा। सुन्द ही (सत्ययुगके अन्तमें) मुचुकुन्द हुआ। इसी प्रकार सुद्युम्न तुरु नामसे, सुमना सोमदत्त नामसे तथा शुभ संवरण नामसे विख्यात हुए। सुशील वसुदान हुआ और सुखद असुपति नामक राजा हुआ। शम्भु सेनापतिके नामसे प्रसिद्ध हुआ। कान्त दशरथके नामसे विख्यात राजा हुए और सोमकी राजा जनक नामसे प्रसिद्धि हुई। राजन्! ये सभी नरेश त्रेतायुगमें हुए थे। वे इस भूमण्डलके राज्य-सुखको भोगकर अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करके निःसंदेह स्वर्गको प्राप्त करेंगे।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! यह उत्तम 'ब्रह्मविद्यामृत' नामक आख्यान है। इसे सुनकर राजर्षि प्रजापालको अत्यन्त आनन्द हुआ और वे अन्तमें तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। इस प्रकार तप एवं ब्रह्मका चिन्तन करते हुए उन्होंने पाञ्चभौतिक शरीरका परित्याग कर दिया और अन्तमें ब्रह्ममें ही लीन हो गये। राजा प्रजापालने यह तपस्या वृन्दावनमें की थी। वहाँ तपस्या करते हुए उन्होंने भगवान् गोविन्दकी इस प्रकार स्तुति की थी।

राजा प्रजापालने कहा—जो सम्पूर्ण जगत्‌के रूपमें विराजमान हैं, गोपेन्द्र एवं उपेन्द्र—जिनके नाम हैं, जिनकी किसीसे तुलना नहीं की जा सकती, जो एकमात्र संसार-चक्रको चलानेमें कुशल हैं तथा पृथ्वी जिनके आश्रयपर टिकी है, उन देवेश्वर भगवान् गोविन्दको मैं नमस्कार करता हूँ। श्रीकृष्ण! आप गौओंके रक्षक हैं। जो दुःखरूपी सैकड़ों लहरोंके उठनेसे भयंकर बन गया है तथा जिसमें वृद्धावस्थारूपी जलकी भँवरियाँ उठ रही हैं एवं जो पातालतक गहरा है, ऐसे संसार-समुद्रमें मैं गोते खाता हूँ। ऐसी स्थितिमें मुझे सुख देनेमें समर्थ एकमात्र आप अप्रमेयस्वरूप प्रभु ही हैं। विभो! आपको मेरा नमस्कार है। भगवन्! आधि-व्याधियों तथा ग्रहोंके द्वारा मैं बार-बार इधर-उधर घसीटा जा रहा हूँ। उपेन्द्र! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके बन्धु हैं। जनार्दन! दुःखी एवं व्याकुल व्यक्तिपर कृपा करना आपका स्वाभाविक गुण है। अतः महाभाग! आपको मेरा नमस्कार है। सुरेश! सर्वज्ञोंमें आपका सबसे श्रेष्ठ स्थान है। यह अखिल विश्व आपके प्रयत्नसे ही विस्तृत है। प्रभो! आपकी छत्र-छायामें गोप आनन्द करते हैं। चक्रधर प्रभो! मैं संसारसे भयभीत हो गया हूँ। अतः मेरी रक्षा करनेकी कृपा कीजिये। अच्युत! आप परम देवता हैं। सुरसमाजमें आपकी प्रधानता है। आप पुराणपुरुष हैं। चन्द्रमामें प्रकाश आपका ही तेज है। अग्नि आपका मुख है। गोपेन्द्र! मैं संसारमें भटक रहा हूँ। मेरी रक्षा आप करें। सुरेश! भला इस सुख-दुःख आदि द्वन्द्वमय संसारमें रहनेवाला कौन ऐसा प्राणी है, जो आपकी मायाको पार कर सके। गोपेन्द्र! आप अगोत्र, अस्पर्श, अरूप, अगन्ध, अनिर्देश्य और अज हैं। जो विद्वान् व्यक्ति ऐसे आप पूजनीय

वराह पुराण · पृष्ठ 94, कुल 414 में से · BharatKosha