भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 165

परिणामविवर्तलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०७

शंका—शुक्ति में चाकचिक्यादि रजत-सादृश्य का दीखना और नीलपृष्ठ त्रिकोणता आदि का न दीखना इसमें क्या निमित्त है ?

समाधान—उस अविद्या में द्रष्टा के काचादिनेत्रदोषों का सान्निध्य रहना ही नीलपृष्ठादिकों के अदर्शन में निमित्त है।

इस प्रकार नेत्रगत कांचादि दोषों से युक्त हुई तूलाविद्या, प्रातिभासिक रजताकार से और उसके ज्ञानकार से (रजताकार वृत्ति से) परिणत होती है। क्योंकि 'ज्ञान' शब्द का अर्थ वृत्ति है।

अब परिणाम का अर्थ बताते हैं—

'परिणामो नाम उपादान समसत्ताक² कार्यापत्तिः विवर्तो नाम उपादान विषमसत्ताक-कार्यापत्तिः। प्रातिभासिकं रजतं-चाविद्यापेक्षया परिणामः, चैतन्यापेक्षया विवर्त इति चोच्यते। अविद्यापरिणामरूपं च तद्रजतमविद्याधिष्ठाने इदमवच्छिन्न-चैतन्ये वर्तते। अस्मन्मते सर्वस्यापि कार्यस्य स्वोपादानाविद्याधिष्ठानाश्रितत्वनियमात्॥

अर्थ—उपादान की जैसी सत्ता हो ठीक वैसी सत्ता से युक्त कार्य की उसे (उपादान को) प्राप्ति होना—परिणाम कहलाता है। और उसकी (उपादान की) सत्ता की अपेक्षा विषमसत्ता से युक्त कार्य की प्राप्ति होना विवर्त कहलाता है। प्रातिभासिक रजत रूप कार्य, अविद्या की अपेक्षा से (अविद्या का) परिणाम है और वही


१. रजतमविद्या-परिणाम इति मन्यते चेत् रजतं ब्रह्मविवर्तो न स्यात्, ब्रह्मपरिणामस्यैव ब्रह्मविवर्तत्वात् विवर्त-परिणामयोरभेदात्, इत्याशङ्कायामुच्यते—'परिणामो-नामे'-ति। एवञ्च विवर्त-परिणामयोर्भेदात् रजतस्य न ब्रह्मविवर्तत्वहानिः।

२. यदा उपादानोपादेययोः एकरूपैव सत्ता, तदा समसत्ता भवति। एवञ्च 'स्वोपादानसत्तासमसत्ताकत्वे सति कार्यत्वम्परिणामत्वम्। अत्र 'स्व' पदमुपादेयपरम्बोध्यम्। ननु शुक्तिरूप्यस्य अविद्यापरिणामत्वं कथमुपादानस्य व्यावहारिकत्वात् उपादेयस्य च प्रातिभासिकत्वात्। तत्रोच्यते—पारमार्थिकसत्त्वं सत्त्वेन व्यवहारविषयत्वं चेति सत्त्वद्वैविध्यमाश्रित्य समसत्ताकत्वोपपत्तिः। तथाचोक्तमद्वैतसिद्धौ—जगदुपादानत्वोपपत्तौ—'समानसत्ताकत्वञ्च रूप्यस्थले सत्त्वद्वैविध्येन वा ब्रह्माज्ञानेतर-ज्ञानबाध्यत्वरूपप्रातिभासिकत्वमादाय वा उपपद्यते।' तथा च शुक्तिरजतादेः स्वोपादानसत्ता-समानसत्ताकत्वात् परिणामत्वम्। ननु अविद्यायां तादात्म्यसम्बन्धेन वर्तमानस्य अविद्यापरिणामस्य रजतस्य, चैतन्ये तत्सम्बन्धेन अवर्तमानत्वात् चैतन्योपादानकत्वासम्भवात् कथं चैतन्यविवर्तत्वं रजतस्येति चेत् अविद्यापरिणामस्य तदधिष्ठानाश्रितत्वनियमान्न विवर्तत्वहानिः।