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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 482 में से

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पृष्ठ 167

रजतस्य साक्षिणि अध्यासः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १०९

को तन्तुदेशत्व (जहाँ तन्तु रहते हैं वहीं पर पट रहता है) है, वैसे ही अविद्या के परिणाम-रूप शुक्तिरूप्य को अविद्यादेशत्व ( जहाँ अविद्या रहती है वहीं वह शुक्तिरजत रहता है) है । अविद्या, चैतन्यनिष्ठ होती है इसलिये शुक्तिरूप्य भी चैतन्यनिष्ठ होता है । इस आशय से मूल में अविद्यापरिणामरूप शुक्तिरजत, अविद्या के अधिष्ठानरूप इदम-वच्छिन्न चैतन्य में रहता है--कहा है । इस वाक्य से निम्नलिखित आशंका का निरसन किया गया है--

शंका--अविद्यापरिणामरूपरजत, अविद्या में तादात्म्य सम्बन्ध से रहता है, तब अविद्या में तादात्म्य सम्बन्ध से रहनेवाले रजत को चैतन्योपादानत्व ( चैतन्य, उसका उपादान है ) नहीं बनता । जब कि चैतन्य में, रजत, अविद्यासम्बन्ध से रहता है तब 'उसे उपादान-विषमसत्ताक कार्यापत्तिरूप विवर्तत्व' कैसे ?

समाधान--अविद्यापरिणामरूप रजत, अविद्याधिष्ठान के आश्रय से रहने के कारण उसे विवर्तत्व हो जाता है क्योंकि 'अविद्यापरिणामरूप रजत, अविद्या के अधिष्ठानभूत चैतन्य के आश्रय से रहता है' यह नियम है । क्योंकि हमारे मत में सभी कार्यों में, उन कार्यों के उपादानभूत अविद्या के अधिष्ठान का आश्रितत्व नियम से रहता है । कोई भी कार्य अपने उपादान कारण के अधिष्ठान के आश्रय से रहता है । इसलिये प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम है और चैतन्य का विवर्त है । अब कोई दोष नहीं है इस समाधान पर पुनः शंका और उसका समाधान—

'ननु चैतन्यनिष्ठ¹स्य रजतस्य कथमिदं रजतमिति पुरोवर्ति-तादात्म्यम् ? उच्यते । यथा न्यायमते आत्मनिष्ठस्य सुखादेः शरीर-निष्ठत्वेनोपालम्भः, शरीरस्य सुखाद्यधिकरणतावच्छेदकत्वात् । तथा चैतन्यमात्रस्य रजतं प्रत्यधिष्ठानतया इदमवच्छिन्नचैतन्यस्य तदधिष्ठा-नत्वेन इदमॊऽवच्छेदकतया रजतस्य पुरोवर्ति संसर्गप्रत्यय³ उपपद्यते ।


१. चैतन्यनिष्ठस्य चैतन्याश्रितस्य चैतन्ये तादात्म्येन उत्पन्नस्येत्यर्थः । 'यत् यत्र तादात्म्येन उत्पद्यते तत् तदभिन्नतया तदाश्रिततया च प्रतीयते' इति नियमः । प्राति-भासिकं रजतं चैतन्ये तादात्म्येन उत्पद्यते चेत् चैतन्याऽभिन्नतया चैतन्याश्रिततया च 'चैतन्यं रजतमिति प्रतीयेत । किन्तु न तथा प्रतीयते, अपि तु 'इदं रजतमिति इदन्तादात्म्य-प्रतीतिर्भवति । अन्योपादेयस्य अन्यतादात्म्याऽयोगः । अतः प्रातिभासिकस्य रजतस्य चैतन्यतादात्म्यमेवोचितं, न इदन्तादात्म्यमिति शङ्काकर्तुराशयः ।
२. 'ष्ठरजः' इति पाठान्तरम् ।
३. पुरोवर्तिसंसर्ग-प्रत्ययः इदं तादात्म्यप्रत्ययः । यथा सुखाधिकरणस्य आत्मनः अवच्छेदके शरीरे सुखस्य संसर्गप्रत्ययो भवति, तथैव रजताधिकरणस्य अवच्छेदके इद-मिति रजतस्य तादात्म्यप्रत्ययो भवितुमर्हति ।