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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 482 में से

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पृष्ठ 171

रजतस्य साक्षिणि अध्यासः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११३

के समान ही शुद्ध चैतन्याऽध्यस्तत्व होने पर भी 'मैं सुखी' यह प्रत्यय होता है। ग्रंथकार ने भी इसी आशय से उपर्युक्त शंका का समाधान किया है। सुखादिकों का 'मैं सुखी' इत्याकारक जो जो ज्ञान होता है, वह, अन्तःकरणावच्छिन्न जो चैतन्य और उसमें रहने वाली (तन्निष्ठ) जो अविद्या उसका कार्यत्व सुखादिकों को होने से नहीं होता है। क्योंकि घटादि व्यावहारिक पदार्थ जैसे शुद्ध चैतन्य में अध्यस्त हैं उसी तरह सुखादिक भी शुद्ध चैतन्य में ही अध्यस्त हैं, इस कारण सुखादिकों को अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ अविद्याकार्यत्व है। परन्तु इसके होने से 'मैं सुखी' ज्ञान होता है—यह नहीं कहा जा सकता।

शंका—यदि ऐसा है तो घटादि, सुखादि और शुक्तिरूप्यादि इनमें से प्रत्येक को प्रतीतिविषयत्व होने के लिये पृथक्-पृथक् नियामक माने गये हैं या एक ही? इस प्रकार वादी के प्रश्न करने पर सिद्धान्ती कहता है घटादिकों को प्रतीति का विषयत्व प्राप्त होने के लिए पृथक् नियामक और सुखादिकों की प्रतीतिविषयत्व में पृथक् तथा शुक्तिरूप्यादिकों की प्रतीतिविषयत्व में भिन्न नियामक मानने में गौरव होता है, इसलिए घटादि, सुखादि और शुक्तिरूप्यादिकों में प्रतीतिविषयत्व प्राप्त होने के लिये सर्वानुगत एक नियामक ही मानना उचित है। इसी आशय का समाधान मूल में 'यस्य यदाकारा०' इत्यादि ग्रंथ से किया गया है। जिस विषय का जिस आकार से अनुभव होता है वह अनुभव, अन्तःकरण में वैसा ही संस्कार उत्पन्न करता है और उस संस्कार से युक्त हुई अविद्या का कार्यत्व जिसमें होता है, उसमें तदाकार अनुभवविषयत्व होता है—यही सर्वत्र अनुगत एक नियामक है। अब 'तथा च०' इत्यादि ग्रन्थ से उक्त नियामक की सर्वत्र योजना करते हैं—

तथा च इदमाकारानुभवाहित संस्कार-सहकृताऽविद्याकार्यत्वात् घटादेरिदमाकारानुभव-विषयत्वम् । अहमाकारानुभवाहित-संस्कारसहिताऽविद्याकार्यत्वादन्तःकरणादेरहं¹माकारानुभवविषयत्वम् । शरीरेन्द्रियादेरुभयविधानुभव²संस्कार³सहिताविद्याकार्यत्वादुभयविधानुभवविषयत्वम् । तथा चोभयविधो ऽनुभवः इदं शरीरमहं देहोऽहं मनुष्योऽहं ब्राह्मण इदं चक्षुरहं काण इदं श्रोत्रमहं बधिर इति ॥


१. 'मनुभवः'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'वाहितसं०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'सहकृतावि०'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'द्यानुभ०'-इति पाठान्तरम् ।
८ वे० प०