वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५८ | वेदान्तपरिभाषा | [ व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम्
संस्कार को उत्पन्न कर के नष्ट होती है । फिर वह उत्पन्न हुआ संस्कार उसने अग्रिम स्मृति को उत्पन्न करता है । इस प्रकार स्मृतिपरम्परा ( धारा ) का होना युक्तियुक्त होता है ।
समाधान—तार्किकों की यह कल्पना उचित प्रतीत नहीं होती । स्मृति के होते ही उसके कारणभूत संस्कार का नाश होता है ऐसी कल्पना करने की अपेक्षा जिस अनुभव से जो संस्कार उत्पन्न हुआ वही संस्कार, उद्बोधक निमित्त से युक्त होने पर उससे स्मृति उत्पन्न होती है । परन्तु उस संस्कार से उत्पन्न हुई स्मृति, अपने उत्पादक संस्कार का नाश नहीं करती, बल्कि उस स्वजनक संस्कार को अधिक दृढ़ करती है । अतः स्मृति, स्वजनक संस्कार का नाश करती है, ऐसी कल्पना करने की अपेक्षा वह स्वजनक संस्कार को दृढ़ करती है, ऐसी कल्पना करने में ही अतिशय लाघव है । कल सुने हुए शास्त्रार्थ का आज स्मरण होता है और उस स्मरण से पूर्व संस्कार दृढ़ होता है । इससे यह स्पष्ट है कि स्मृति, स्वजनक संस्कार का नाश नहीं करती । श्रुत-शास्त्रार्थ का स्मरण होने पर यदि उसके कारणभूत संस्कारों का नाश हुआ होता, और उस स्मृति के द्वारा अन्य नवीन ही संस्कार उत्पन्न किया होता तो शास्त्रार्थ में दृढ़त्व कैसे आता ?
शिवाय संस्कार से स्मृति की उत्पत्ति, और स्मृति के होने पर उत्पन्न होनेवाले संस्कार के द्वारा ही स्मृति का नाश होता है, यह यदि माना जाय तो संस्कार को ही स्मृतिजनकत्व और उसका विनाशकत्व है, यह कहना होगा । इसी प्रकार स्मृति से उत्पन्न हुए संस्कार में ही स्मृतिजन्यत्व और नाश्यत्व है, यह भी कहना होगा । इस प्रकार अनेक विरुद्ध पदार्थों की कल्पना करनी पड़ती है । ‘स्मृति को संस्कारनाशकत्व है’ यह पक्ष श्रेयोवह नहीं है ।
‘संस्कार ही अनुमिति में हेतु है’ यह मानने पर उद्बुद्ध न हुए संस्कार से अनुमिति होने लगेगी—यह आशंका उचित नहीं है । क्योंकि पक्षधर्मताज्ञानजन्य संस्कार का उद्बोध होना भी अनुमिति में सहकारि-कारण है, अर्थात् उद्बुद्ध संस्कार से ही अनुमिति होती है ।
एवं¹ च अयं धूमवानिति पक्ष²धर्मताज्ञाने³न, धूमो⁴ वह्निव्याप्य
१. एवं च—अनुमिति परामर्शस्य कारणत्वे निराकृते उद्बुद्धसंस्कारस्य कारणत्वे सिद्धे च । ‘पर्वतो वह्निमान्’ इत्यनुमितौ असाधारणकारणस्य पक्षधर्मताज्ञानस्य आकारः ‘अयं धूमवान्’ इति ।
२. पक्षधर्मताज्ञाने—पक्षस्य धर्म एव पक्षधर्मता, स्वार्थे ‘तल्’ प्रत्ययः । सा च धूमादिरूपलिङ्गवत्ता, तस्या ज्ञाने अर्थात् लिङ्गप्रकारक-पक्षविशेष्यकज्ञाने । अत एव—‘अयं धूमवान्’ इत्याकारः प्रदर्शितः ।
३. ‘ने धूमोः’ इति पाठान्तरम् ।
४. अनुमितौ द्वितीयमसाधारणं कारणं दर्शयति ‘धूमो वह्निव्याप्यः’ इति महान-