वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकामादीनां मनोधर्मत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २९
होकर भगवती श्रुति भी प्रमाण है। इस आशय से 'कामः संकल्पः' इत्यादि श्रुति का निर्देश किया है।
शंका—इस श्रुतिवचन में 'ज्ञान' शब्द तो कहा नहीं है तब उसके अन्तःकरण-धर्मत्व में श्रुति कैसे प्रमाण हो सकती है ?
समाधान—इस श्रुति में 'धी' शब्द से वृत्तिरूप ज्ञान ही विवक्षित है। 'धी' शब्द का अर्थ वृत्तिरूप ज्ञान होने से उसमें मनोधर्मत्व है।
शंका—( प्रतिज्ञा )—श्रुतिगत 'धी'¹ शब्द-वाच्य ज्ञान, मन का धर्म नहीं है, ( अन्तःकरण उसका उपादान कारण नहीं है )—( हेतु )—क्योंकि उसमें मानस-प्रत्यक्षत्व है ( वह मन, इस अन्तरिन्द्रिय को प्रत्यक्ष ज्ञात होता है )। ( दृष्टान्त )—कामादि अन्य पदार्थों के समान। परन्तु 'उसे अन्तःकरणोपादानक न मानने पर 'सर्वं मन एव' श्रुति से विरोध होगा--यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि उस 'धी' शब्दवाच्य ज्ञान का मनोजन्यत्व है ( वह मन से उत्पन्न होता है ) इस अर्थ में उस श्रुति की व्यवस्था लगाई जा सकती है।
समाधान—'सर्वं मन एव'—कामादि समस्त, मन ही ( अन्तःकरण ही ) है, इस श्रुति में 'कामादि समस्त' और 'मन' का सामानाधिकरण्य है। इस कारण 'मृद्घटः' मृत्तिका ही घट है इस वाक्य के मृत्तिका और घट–इन दो शब्दों के सामानाधिकरण्य से ( एक विभक्ति में होने के कारण ) मृत्तिका उपादान है और घट, कार्य अर्थात् उपादेय है, यह जैसे सिद्ध होता है, उसी तरह 'सर्वं मन एव' इस वाक्य में भी 'धी' शब्दवाच्य ज्ञान में भी अन्तःकरणोपादानकत्व है, यह निश्चित किया जाता है। 'अन्तःकरण उस ज्ञान का उपादान नहीं है, वह मनोजन्य है' यह स्वीकार करने में 'सर्वम्' और 'मनः' शब्दों का सामानाधिकरण्य बाधक है। इसके अतिरिक्त आपने उपर्युक्त अनुमान में 'कामादि अन्य पदार्थों के समान' दृष्टान्त दिया है। परन्तु यह दृष्टान्त साध्यविकल है। 'ज्ञान का अन्तःकरणोपादानकत्व न रहना' साध्य है। उसमें कामादि को तो अन्तःकरणोपादानकत्व ही है, तदनुपादानकत्व नहीं है। इसलिए 'कामादिक' साध्य से विकल ( शून्य ) हैं। इस आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—'अत एव' उस कारण ही अर्थात् 'सर्वं मन एव' ऐसी सामानाधिकरण्यश्रुति होने से ही श्रुत्युक्त कामादि समस्त वृत्तियों में मनोधर्मत्व है। वे सब वृत्तियाँ अन्तःकरणोपादानक हैं। अब श्रुत्युक्त कामादिकों में भी अन्तःकरणोपादानकत्व ( मनोधर्मत्व ) है—इस सिद्धान्त पर शंका—
१. 'धी'-शब्दवाच्यं ज्ञानं, अन्तःकरणोपादानकं न भवति, मानसप्रत्यक्षत्वात् कामादिवत्।'
अत्र दृष्टान्तः साध्यविकलः। ज्ञाने अन्तःकरणोपादानकत्वाभाववत्त्वस्य साध्यत्वात्। कामादीनां तु अन्तःकरणोपादानकत्वमेवेति।