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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
पृष्ठ 482स्थायी लिंक
४२४ वेदान्तपरिभाषा
| उद्धरण | आकर ग्रन्थ | पृ० सं० |
|---|---|---|
| मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं | शारीरकोपनिषद् २ | ७४ |
| मायां तु प्रकृतिं विद्यात् | श्वेताश्वतर ४।१० | ६१ |
| यः सर्वज्ञः | मुं. उ. १।१।६ | ३२६ |
| यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति | ३३ | |
| यतो वा इमानि | तै. उ. ३।१ | ३३१ |
| यत्र त्वस्य सर्वम् | बृहदारण्यक ४।४।१२ | १७ |
| यत्र हि द्वैतमिव | ” ४।२।१२ | १७ |
| यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा | ३२६ | |
| यदा सुप्तः | कौ. उ. ३।२ | ३४५ |
| यावदधिकारमवस्थिति | ब्रह्मसूत्र ३।२।३२ | |
| रमणीयचरणा | छान्दोग्य | ३४४ |
| विज्ञानमानन्दं ब्रह्म | बृहदारण्यक ३।१८ | ३८१ |
| विश्वजिता यजेत | तां. म. ब्रा. १६।४।२ | २७१ |
| वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् | ३२ | |
| वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः | ब्रह्मसूत्र २।४।२३ | ३३६ |
| शक्तितात्पर्यं ⋯ अङ्गीक्रियते | विवरण | ३६७ |
| शास्त्रदृष्ट्या | ब्रह्मसूत्र १।१।३१ | ३८५ |
| संसर्गासङ्गि | चित्सुखी | ८४ |
| स प्रजापतिरात्मनो | सं. २।१।२ | २०२ |
| सच्च त्यच्चाभवत् | तै. उ. २।६ | ३३२ |
| सता सोम्य | छान्दोग्य ६।८।१ | ३४५ |
| सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म | तै. उ. २।१।१ | ३२७ |
| सदेव सौम्येदमग्र | छान्दोग्य ६।२।१ | ८३ |
| समिधो यजति | तै. सं. २।६।१ | २४३ |
| सर्वं एकीभवन्ति | ३४६ | |
| सर्वेषामेव | चित्सुखी ७ | १७० |
| स वै शरीरी प्रथमः | ३४२ | |
| सा वैश्वदेव्यामिक्षा | मै. सं. १.१०।१ | १६५ |
| सूर्याय जुष्टं निर्वपामि | २०४ | |
| सोऽकामयत | तै. २।६ | ३३० |
| सोऽरोदीत् | तै. सं. २।२।२ | २४० |
| स्वर्गकामो 'ज्योतिष्टोमेन यजेत' | आ. श्रौ. १०।२।१ | २४४ |
| स्वार्थबोधे समासानाम् | तं. वा. पृ० ३६६ | २४३ |
| हन्ताहमिमास्तिस्रो | छान्दोग्य ६।३।२ | ३४२ |
| हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे | यजुर्वेद १३।४ | ३४३ |