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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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अनुबन्ध चतुष्टय १११ शब्द बनता है। इसका अर्थ है- 'कुत्सित शरीर में निवास करने वाला-जीवात्मा।' जिन सूत्रों में उस जीवात्मा के यथार्थस्वरूप का प्रतिपादन किया गया है, उन्हें शारीरकसूत्र नाम दिया गया। इन सूत्रों की रचना महर्षि व्यास द्वारा की गयी है। इन्हीं का दूसरा नाम ब्रह्मसूत्र भी है। सूत्रादीनि में प्रयुक्त आदि शब्द से अभिप्राय श्रीमद्भगवद्गीता एवं इसीप्रकार के अन्यग्रन्थों से लिया जाना चाहिए। जिनमें आत्म-तत्त्व का विवेचन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता आत्मतत्त्व विवेचन करने वाला उत्कृष्टग्रन्थ माना गया है। इसमें वेदान्तस्वरूप उपनिषद् में प्रतिपादित दर्शन की ही पुष्टि एवं व्याख्या की गयी है। इस दृष्टि से इसे भी उपनिषदों का उपकारक कहा गया है। इसलिए वेदान्तदर्शन को भलीप्रकार समझने के लिए ब्रह्मसूत्र एवं श्रीमद्भगवद्गीता आदि वेदान्तसिद्धान्त के प्रतिपादक ग्रन्थों का जिज्ञासु अथवा साधक को अवश्य अध्ययन करना चाहिए। ऐसा ग्रन्थकार का अभिप्राय स्वीकार किया जा सकता है। (घ) उपर्युक्त खण्ड के तृतीय अंश में ग्रन्थकार प्रस्तावित 'वेदान्तसार' को वेदान्तदर्शन का प्रकरणग्रन्थ बताते हुए वेदान्त के सभी अनुबन्ध चतुष्टय को प्रस्तुतग्रन्थ पर भी लागू होने की बात कहते हुए, उन्हें पृथक् मानने की आवश्यकता नहीं है, ऐसा प्रतिपादन करते हैं। इस प्रसङ्ग में प्रकरण एवं अनुबन्ध दो शब्द विशेष व्याख्या की अपेक्षा रखते हैं- (१) प्रकरणग्रन्थ - यदि किसी ग्रन्थ में शास्त्रविशेष के किसी एक भाग अथवा सिद्धान्त का विस्तृतविवेचन सरलतम रीति से प्रस्तुत किया जाता है तो वह ग्रन्थ उस शास्त्र का प्रकरणग्रन्थ कहलाता है। जैसे- नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों का सरलतम ढंग से प्रतिपादन करने वाला आचार्य धनञ्जय विरचित दशरूपकम् नामक ग्रन्थ। ठीक इसीप्रकार प्रस्तुत वेदान्तसार में भी वेदान्तदर्शन के सिद्धान्तों को सरलरूप में प्रतिपादित किया गया है। अतः इसे भी 'वेदान्त' का प्रकरणग्रन्थ कहा गया है। (२) अनुबन्ध - कोई भी व्यक्ति ग्रन्थविशेष को देखने के पश्चात् इसप्रकार विचार करता है- (क) यह किस विषय का ग्रन्थ है? अर्थात् इसमें किस विषय का प्रतिपादन किया गया है। (ख) क्या मैं इस ग्रन्थ को पढ़ सकता हूँ अथवा क्या इसे पढ़ने का मैं अधिकारी हूँ, क्योंकि कोई भी व्यक्ति प्रत्येक विषय को पढ़ने तथा समझने में समर्थ नहीं हो सकता। (ग) इस पुस्तक में प्रतिपादितविषय तथा पुस्तक के नामकरण में क्या कोई