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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 314 में से

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१५२ वेदान्तसार

आदि पाँच विशेषणों का उल्लेख किया है। जिनकी हम यहाँ विस्तारपूर्वक व्याख्या कर रहे हैं- (१) सदसद्भ्यामनिर्वचनीयम्-इसी प्रसङ्ग में अज्ञानरूप अवस्तु की व्याख्या करते हुए ग्रन्थकार ने इसे सत् एवं असत् से भिन्न होने के कारण अनिर्वचनीय कहा है, क्योंकि अज्ञान यदि सद्रूप में होता तो ब्रह्म के समान कभी भी इसका बाध नहीं होता। जबकि ब्रह्मविषयकज्ञान के पश्चात् इसकी निवृत्ति हो जाती है। इस दृष्टि से यह सत् नहीं कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि इसे हमं असत् मानें तो बांझ-स्त्री के समान कभी भी हमें इसकी प्रतीति नहीं होनी चाहिए। जबकि किसी वस्तु को न जानने की स्थिति में 'मैं इस विषय में अज्ञानी हूँ' ऐसा अनुभव प्रत्येक व्यक्ति को होता है। इसलिए अज्ञान को असत् रूप वाला भी नहीं कह सकते हैं। परिणामस्वरूप सत् एवं असत् से विलक्षण होने के कारण इसके लिए 'अनिर्वचनीय' रूप एक विशेषण प्रदान करना ही उचित एवं न्यायसंगत प्रतीत होता है। जिसका ग्रन्थकार ने यहाँ उल्लेख किया है। (२) त्रिगुणात्मक-इस प्रसंग में यह शङ्का होना स्वाभाविक है कि अज्ञान के अनिर्वचनीय होने से कहीं उसके अस्तित्व के विषय में तो आपको संदेह नहीं है। इस शङ्का का निवारण करते हुए ग्रन्थकार ने इसका 'त्रिगुणात्मक' विशेषण प्रस्तुत किया। अज्ञान की त्रिगुणात्मकता श्रुति, स्मृति एवं अनुभव के आधार पर सिद्ध की जा सकती है। दैनिकजीवन में हम तेज में लोहित, जल में शुक्ल तथा पृथिवी में कृष्णवर्णों का अवलोकन करते हैं तथा सत्कार्यवाद के सिद्धान्त के अनुसार कारण के गुण कार्य में भी विद्यमान रहते हैं। इसलिए यह दृश्यमानजगत् अज्ञान का कार्य होने से त्रिगुणात्मक दिखायी देता है। अतः इसकारण अज्ञान का त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रजस्-तमस्) गुणवाला होना सिद्ध होता है। “अजामेकां लोहितशुक्ल कृष्णां” इत्यादि अनेक श्रुतिवचन भी इस कथ्य की पुष्टि में प्रमाण हैं। (३) ज्ञानविरोधी- वेदान्तदर्शन एकमात्र ब्रह्म की सत्ता को ही स्वीकार करता है। उसके अनुसार यह सम्पूर्ण दृश्यमानजगत् रस्सी में सर्प की भ्रान्ति के समान मिथ्या है। 'आवरण' एवं 'विक्षेप' इन दो शक्तियों से युक्त यह अज्ञान ही शुद्धचैतन्यब्रह्म को आवृत्त कर उसमें सृष्टि का असदाभास कराता है। यह अज्ञान ही ब्रह्म के साक्षात्कार में बाधक है। इसके कारण ही हम ब्रह्म के वास्तविकस्वरूप को पहचानने में असमर्थ रहते हैं। इसलिए यह