वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंअज्ञान निरूपण १६१ ‘चन्द्रिका’- अज्ञान के समष्टिस्वरूप की व्याख्या के पश्चात् प्रस्तुत गद्यखण्ड में उसके व्यष्टिस्वरूप की विस्तृत व्याख्या करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं-‘जिसप्रकार किसी वन में स्थित वृक्षों को अलग-अलग कहने की भावना से अनेकता को सूचित करने वाला ‘वृक्ष’ यह शब्द व्यवहार में लाया जाता है। ठीक इसीप्रकार जलाशय में स्थित जल को उसके अवयवों को अलग-अलग कहने की दृष्टि से ‘अनेकजल’ इसप्रकार प्रयोग करते हैं। उसीप्रकार अज्ञान के व्यष्टिरूप को भी ‘अनेकअज्ञान’ इसप्रकार कहकर उसमें बहुत्व का व्यवहार किया जाता है, क्योंकि अज्ञानों के व्यष्टिगतभेद को प्रदर्शित करना ही अज्ञान के अनेकत्व के व्यवहार का मुख्य आधार है। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि ‘अज्ञान के कारण ही यह इन्द्र अर्थात् आत्मा अनेकरूपों वाला प्रतीत होता है।’ यहाँ प्रयुक्त इन्द्र शब्द ईश्वर या आत्मतत्त्व का वाचक माना गया है। माया यहाँ अज्ञान के लिए आया है। यों भी माया, ईश्वर की शक्ति कही गई है। इस दृष्टि से उक्त श्रुतिवचन का अभिप्राय हुआ-‘यद्यपि सृष्टि का कारणरूप वह ईश्वर एक ही है, किन्तु अज्ञान के कारण वह संसार के बहुत से जीवों में स्थित होकर ठीक उसीप्रकार अनेकरूपों में भासित होता है, जैसे-एक ही चन्द्रमा जल की लहरों में हमें अनेकरूपों वाला होकर प्रतिभासित होता है।’ इसप्रकार स्पष्ट है कि व्यष्टि अर्थात् अनेकता एवं समष्टि अर्थात् एकता इन दोनों के व्यवहार का एकमात्र आधार इनका व्यष्टिगत एवं समष्टिगत व्यापकभाव ही है, अन्य कुछ नहीं। संसार के सभी जीवों के अज्ञान को एक ज्ञान का विषय मानकर समष्टिरूप में देखा जाता है। जबकि व्यष्टिगत अज्ञान में समस्तजीवों के भिन्न-भिन्नरूप को भिन्न-भिन्न अज्ञानों का विषय मानकर अलग-अलग देखा जाता है। इस बात को एक उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझा सकते हैं-मिट्टी द्वारा निर्मित कुल्हड़, घड़ा, सकोरा, दीपक इत्यादि अनेकरूपों में एकमात्र मिट्टी ही अपने व्यापकरूप में समानरूप से विद्यमान है। अतः जब हम इसे समष्टिरूप में कहना चाहेंगे तो ‘सर्वत्र मिट्टी ही है’ ऐसा व्यवहार करेंगे, किन्तु व्यष्टिरूप की विवक्षा में ‘इन्हें घड़ा आदि अलग-अलग नामों’ से ही कहा जाएगा। ठीक इसीप्रकार अज्ञान की एकरूपता (समष्टि) तथा अनेकरूपता (व्यष्टि) को भी समझना चाहिए।