वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें१७० वेदान्तसार विशुद्धचैतन्य परंब्रह्म ही है। इसीको वेदान्त ने 'तुरीय' अर्थात् चतुर्थ संज्ञा प्रदान की है। परमविशुद्धचैतन्य को 'तुरीय' कहने पर विभिन्न आचार्यों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। जैसे (1) शङ्कराचार्य के अनुसार प्राज्ञ, तेजस् और विश्व की अपेक्षा चतुर्थ होने के कारण इसे 'तुरीय' कहा जाता है। (2) सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत इन तीन अवस्थाओं से भिन्न अर्थात् चतुर्थ होने के कारण इसे 'तुरीय' कहते हैं। (3) आपदेव ने अविद्या, ईश्वर और प्राज्ञ की अपेक्षा चतुर्थ होने से इसे 'तुरीय' माना है। प्रस्तुत ग्रन्थ में उक्त सभी का प्रतिपादन किया गया है। अतः इन सभी दृष्टियों से शुद्ध चैतन्य का 'तुरीय' नाम उचित ही है। इसी क्रम में अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार 'शिवम्' इत्यादि श्रुतिवचन प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। 'शिव' शब्द यहाँ परंब्रह्म शुद्ध चैतन्य के लिए प्रयुक्त हुआ है। सभी वेदान्तशास्त्रों ने प्रायः विशुद्ध ब्रह्म अथवा अद्वैत ब्रह्म को ही चतुर्थ माना है। प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को चित्र के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है- चित्र-३४ यथा वन से वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश आधारभूत महाकाश जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश जल में तथैव समष्टि विषयक अज्ञान आधारभूत शुद्ध ब्रह्म व्यष्टि विषयक अज्ञान तदुपहित ईश्वर जीव तदुपहित चैतन्य चैतन्य चतुर्थ-तुरीय-चतुर्थ तत्पश्चात् प्रस्तुत खण्ड के द्वितीय अंश को स्पष्ट करते हैं-