वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 187, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंशक्तिद्वय-निरूपण १७३ अवतरणिका-तुरीय अर्थात् शुद्धचैतन्य की विशेषताओं का कथन करने के पश्चात् ग्रन्थकार अज्ञान की आवरण एवं विक्षेप नामक दो शक्तियों का सोदाहरण उल्लेख करते हैं- अस्याज्ञानस्यावरणविक्षेपनामकमस्ति शक्तिद्वयम्। आवरण शक्तिस्तावदल्पोऽपि मेघोऽनेकयोजनायतमादित्यमण्डलमवलोकयितृनयन- पथपिधायकतया यथाच्छादयतीव तथाज्ञानं परिच्छिन्नमप्यात्मानम- परिच्छिन्नमसंसारिणमवलोकयितृबुद्धिपिधायकतयाच्छादयतीव तादृशं सामर्थ्यम्। तदुक्तम्- “घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं यथा मन्यते निष्प्रभं चातिमूढः। तथा बद्धवद्भाति यो मूढदृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा” इति॥ पदच्छेद- अज्ञानस्य आवरण-विक्षेपनामकम् अस्ति शक्तिद्वयम्। आवरणशक्तिः तावत् अल्पः अपि मेघः अनेकयोजन-आयतम् आदित्यमण्डलम्-अवलोकयितृ-नयनपथ-पिधायकतया यथा आच्छादयति इव, तथा अज्ञानम् परिच्छिन्नाम् अपि आत्मानम् अपरिच्छिन्नम् असंसारिणम् अवलोकयितृ-बुद्धिपिधायकतया आच्छादयति इव, तादृशम् सामर्थ्यम्। तद् उक्तम्- अन्वय-यथा घनच्छन्नदृष्टिः अतिमूढः (जनः) घनच्छन्नम् अर्कम् निष्प्रभम् च मन्यते, तथा मूढदृष्टेः यः (आत्मा) बद्धवत् भाति, नित्योपलब्धिस्वरूपः सः आत्मा अहम् (इति कथ्यते) अनुवाद-आवरण और विक्षेप नामक अज्ञान की दो शक्तियाँ हैं। जिसप्रकार छोटा सा बादल का टुकड़ा भी दर्शन के दृष्टिपथ को ढककर अनेक योजन तक फैले हुए सूर्यमण्डल को आच्छादित-सा कर देता है, उसीप्रकार सीमित अज्ञान भी असीम और असांसारिक आत्मा को देखने वाले की बुद्धि को आच्छादित करके मानो ढक देता है। (यह) आवरण शक्ति तो उसप्रकार की सामर्थ्य से युक्त है। इसलिए कहा गया है- “जिसप्रकार मेघ से आच्छन्न दृष्टिवाला अत्यन्त मूर्ख व्यक्ति, बादल से ढके हुए सूर्य को प्रकाशरहित मानता है। उसीप्रकार मूढ़ सामान्यदृष्टि वालों को जो आत्मा (जन्म मरणादि बन्धनों से) बँधा हुआ-सा प्रतीत होता है, ऐसा नित्य एवं ज्ञानस्वरूप वह आत्मा अहम् (इसप्रकार कहा गया) है।