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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 314 में से

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शक्तिद्वय-निरूपण १७५ विशेष-(1) अज्ञान की दो शक्तियों का उल्लेख किया गया- आवरण एवं विक्षेप। (2) प्रस्तुत गद्यखण्ड में केवल 'आवरण' शक्ति को उदाहरण देकर समझाया गया है। (3) यहाँ प्रदत्त उदाहरण अत्यन्त सटीक है। मेघखण्ड अज्ञान का प्रतीक है तथा तेजस्वी सूर्य तेजोरूपं आत्मा को संकेतित करता है। (4) प्रस्तुत गद्यखण्ड में प्रयुक्त 'इव' आभासरूप अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। अभिप्राय यह है कि सूर्य वस्तुतः ढकता नहीं है, अपितु ढका हुआ सा प्रतीत होता है। वैसा ही आत्मा के विषय में भी मानना चाहिए। (5) हस्तामलक नामक ग्रन्थ में आई हुई प्रस्तुत कारिका में प्रयुक्त 'बद्धवत् भाति' पद भी इसी अभिप्राय को अभिव्यक्त करता है, क्योंकि वेदान्त की दृष्टि में आत्मा का बन्धन अथवा मोक्ष सम्भव नहीं है। यह तो केवल आभासमात्र है, रस्सी में सर्प के समान अथवा सीप में चांदी के समान। (6) अज्ञान की आवरणशक्ति को समझाने के लिए मेघखण्ड एवं सूर्य का प्रस्तुत उदाहरण सम्पूर्ण दार्शनिकजगत् में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ है। (7) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-३६ अज्ञान/माया की शक्ति द्वय आवरण (आच्छादन) विक्षेप (उद्भावन) (सत्य को आवृत करना) (सत् में असत् की उद्भावना) ↓ ↓ (आत्मतत्त्व/ब्रह्म को आवृत करना) यथा ↓ ↓ (रज्जु में सर्पप्रतीति) (मेघखण्ड द्वारा सूर्य को ── उदाहरण ढकने के समान (सीप में चाँदी का आभास) (रज्जु एवं सीप के एतद्विषयक चित्र-३७ (ब्रह्म में सम्पूर्ण नाम रूपात्मक ज्ञान को आच्छादित करना जगत् की प्रतीति सूर्य ← मेघखण्ड द्रष्टा ──रस्सी (सर्पोऽयम्)