वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकारण-निरूपण १७९ दो कारणों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इनमें से एक के भी अभाव में किसी भी वस्तु का निर्माण असम्भव है। उपादान एवं निमित्तकारण इन दोनों को हम घड़े के उदाहरण द्वारा भलीप्रकार समझ सकते हैं। घड़े के निर्माण में हमें मिट्टी की आवश्यकता होती है, जो उसके निर्माण की स्थूल एवं अनिवार्य सामग्री है। अतः मिट्टी घड़े का उपादानकारण कहलाएगी। न्याय की दृष्टि में यही समवायीकारण भी कहलाता है, क्योंकि मिट्टी घड़े के साथ समवायसम्बन्ध से विद्यमान रहती है। दूसरा, निमित्तकारण है जो वस्तु की संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है। घड़े के निर्माण में दण्ड, चक्र, चीवर और कुम्हार ये सभी निमित्तकारण कहलाएंगे, क्योंकि इनमें से एक के भी अभाव में घटनिर्माण असम्भव है। सामान्यरूप से ये दोनों कारण अलग-अलग स्थानों पर विद्यमान रहते हैं अर्थात् इनकी पृथक् सत्ता रहती है, किन्तु वेदान्त सृष्टि- प्रक्रिया में इन दोनों की स्थिति एक ही स्थान पर मानते हुए कहता है कि- जिसप्रकार एक मकड़ी अपने जालानिर्माणरूप कार्य के प्रति अपने शरीर के चैतन्य की प्रधानता के कारण निमित्तकारण है तथा अपने शरीर से निकलने वाले लारवे की प्रधानता की दृष्टि से उपादानकारण भी होती है। ठीक उसीप्रकार अज्ञान से उपहित आत्मा अपने चैतन्य की प्रधानता होने से दृश्यमान सांसारिकप्रपञ्च का निमित्तकारण तथा अज्ञान की प्रधानता के समय उपादानकारण होता है। क्योंकि मकड़ी का शरीर चैतन्य के अभाव में जाल बनाने में असमर्थ होता है। साथ ही केवल चैतन्य होने पर शरीर के न होने पर भी जाल नहीं बनाया जा सकता है। इस दृष्टि से एक ही मकड़ी शरीर की प्रधानता होने पर जालेरूप कार्य के लिए उपादानकारण तथा चैतन्य की प्रधानता होने पर निमित्तकारण हो जाती है। ठीक उसीप्रकार सृष्टिरूपकार्य के प्रति आवरण एवं विक्षेप दो शक्तियों से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्यरूप आत्मा अज्ञानरूप उपाधि की प्रधानता होने से उपादानकारण तथा चैतन्य की प्रधानता से निमित्तकारण भी होता है। इसमें किसीप्रकार की कोई विसंगति नहीं है, क्योंकि यह संसार अज्ञानजन्य है और वह अज्ञान आत्मनिष्ठ है। इसलिए माया से युक्त ईश्वर को जगत् का उपादानकारण कहने में कोई बाधा नहीं है। जिसप्रकार मकड़ी को