वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 195, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंकारण-निरूपण १८१ चित्र-३८ आत्मा। ईश्वर अज्ञान ब्रह्म अविद्या माया चैतन्य की प्रधानता से सूक्ष्मशरीर से लेकर ब्रह्माण्ड शरीर की पर्यन्त संसार के प्रधानता से निमित्तकारण उपादानकारण प्रति लूता (मकड़ी) वत् चैतन्य की प्रधानता से निमित्तकारण तन्तु (जाला) रूप शरीर की प्रधानता से कार्य के प्रति उपादानकारण अवतरणिका-आवरण एवं विक्षेपशक्ति से युक्त अज्ञान से उपहित चैतन्य अर्थात् ईश्वर को सम्पूर्णसृष्टि का उपादान एवं निमित्तकारण बताने के पश्चात् उसकी विक्षेपशक्ति द्वारा सर्वप्रथम जगत् की सूक्ष्मसृष्टि का कथन करते हैं- तमःप्रधानविक्षेपशक्तिमदज्ञानोपहितचैतन्यादाकाश आकाशा- द्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी चोत्पद्यते "तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूत" इत्यादिश्रुतेः। तेषु जाड्याधिक्यदर्शनात्तमःप्राधान्यं तत्कारणस्य। तदानीं सत्त्वरजस्तमांसि कारणगुणप्रक्रमेण तेष्वाकाशादि- षूत्पद्यन्ते। एतान्येव सूक्ष्मभूतानि तन्मात्राण्यपञ्चीकृतानि चोच्यन्ते। एतेभ्यः सूक्ष्मशरीराणि स्थूलभूतानि चोत्पद्यन्ते॥१२॥ पदच्छेद-तमः प्रधानविक्षेपशक्तिमद् अज्ञानोपहित-चैतन्याद् आकाशः, आकाशाद् वायुः, वायोः अग्निः, अग्नेः आपः, अद्भ्यः पृथिवी च उत्पद्यते। “तस्माद् वा एतस्माद् आत्मनः आकाशः सम्भूतः” इत्यादि श्रुतेः। तेषु जाड्याधिक्य-दर्शनात् तमः प्राधान्यम् तत्कारणस्य।