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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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२१० वेदान्तसार इस जाग्रत अवस्था में समष्टिरूप उपाधि से उपहित हुआ वैश्वानर अथवा विराट् नामक यह चैतन्य एवं व्यष्टि-उपाधिरूप 'विश्व' ये दोनों-दिशा, वायु, सूर्य, वरुण तथा अश्विनीकुमार देवों से अधिष्ठित क्रमशः श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन गुणों को ग्रहण करते हैं। इसीप्रकार अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, यम और प्रजापति इन देवताओं से नियन्त्रित क्रमशः वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रमशः बोलना, ग्रहण करना (आदानप्रदान), चलना, मलत्याग एवं आनन्दरूप कार्यों को सम्पादित करते हैं। इसके अतिरिक्त चन्द्र, ब्रह्मा, शङ्कर तथा विष्णु इन देवों द्वारा अधिष्ठित क्रमशः मन, बुद्धि, अहङ्कार तथा चित्तरूपी चार अन्तः इन्द्रियों के माध्यम से क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, गर्व एवं स्मरणरूपी सभी स्थूलविषयों का अनुभव करते हैं। अपने कथन की पुष्टि में माण्डूक्योपनिषद् की उक्ति को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि-“जाग्रत अवस्था से युक्त यह चैतन्य ही सम्पूर्ण बाह्यविषयों से अवगत रहता है।” इस स्थिति में भी अर्थात् स्थूल समष्टि एवं व्यष्टि में, उनसे उपहित 'विश्व' और वैश्वानररूप चैतन्य में वन से अवच्छिन्न आकाश तथा वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश, जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश एवं जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान परस्पर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, अपितु शुद्धचैतन्य की दृष्टि से दोनों समान हैं। तत्पश्चात् अन्त में प्रकरण का उपसंहार करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि इसप्रकार पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूलप्रपञ्च की सृष्टि होती है। विशेष-(1) 'अभिमानी' शब्द का प्रयोग यहाँ 'अधिष्ठाता' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। (2) प्रस्तुत गद्यखण्ड के प्रारम्भिक अंश में प्रयुक्त 'नर' शब्द समस्त प्राणियों का उपलक्षण है। (3) छान्दोग्य एवं श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी वैश्वानर एवं विराट् शब्दों का ही प्रयोग हुआ है।