भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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महावाक्यार्थ-निरूपण २४७ चित्र-५३ शोणो धावति शोणः (लाल) धावति-वाच्यार्थ (रंग विशेष) (दौड़ता है) लाल रंग होने से गति का अभाव पुनः मुख्यार्थ बाध लक्षणा द्वारा घोड़ा रूप अर्थ की प्रतीति अजहत् लाल रंग का घोड़ा धावति-वाच्यार्थ रंग सहित घोड़ा रूप अर्थ की प्रतीति के कारण अजहल्लक्षणा चित्र संख्या-52 के समान तत्त्वमसि वाक्य को समझें। अवतरणिका-इसप्रकार यहाँ तक 'तत्त्वमसि' वाक्य में जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा के अनौचित्य का प्रतिपादन करने के पश्चात् 'सोऽयं देवदत्तः' के समान भागलक्षणा अर्थात् जहदजहल्लक्षणा का कथन करते हैं- तस्माद्यथा सोऽयं देवदत्त इति वाक्यं तदर्थो वा तत्कालैतत्काल- विशिष्टदेवदत्तलक्षणस्य वाक्यार्थस्यांशे विरोधाद्विरुद्धतत्कालैतत्काल- विशिष्टत्वांशं परित्यज्याविरुद्धं देवदत्तांशमात्रं लक्षयति तथा तत्त्वमसीतिवाक्यं तदर्थो वा परोक्षत्वापरोक्षत्वादिविशिष्ट- चैतन्यैकत्वलक्षणस्य वाक्यार्थस्यांशे विरोधाद्विरुद्धपरोक्षत्वापरोक्षत्वादि- विशिष्टत्वांशं परित्यज्याविरुद्धमखण्डचैतन्यमात्रं लक्षयतीति॥२७॥ पदच्छेद-तस्मात् यथा 'सः अयम् देवदत्तः' इति वाक्यम् तद् अर्थः वा, तत्काल-एतत्काल-विशिष्ट-देवदत्त-लक्षणस्य वाक्यार्थस्य अंश विरोधाद् विरुद्ध-तत्काल-एतत्काल-विशिष्टत्व-अंशम् परित्यज्य, अविरुद्धम् देवदत्तांश-मात्रम् लक्षयति। तथा 'तत्त्वमसि' इति वाक्यम् तद् अर्थः वा परोक्षत्व- अपरोक्षत्वादि-विशिष्ट-चैतन्य-एकत्वलक्षणस्य, वाक्यार्थस्य अंश विरोधाद्-विरुद्ध, परोक्षत्व-अपरोक्षत्वादि-विशिष्टत्वांशम् परित्यज्य अविरुद्धम् अखण्ड चैतन्यमात्रम् लक्षयति, इति॥27॥