भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 314 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 270

२५६ वेदान्तसार व्याप्यत्व को स्वीकार करने से, फल व्याप्यत्व के प्रतिषेध प्रतिपादन के कारण विरोध नहीं है। इसीलिए कहा गया है- "इस (ब्रह्म) के (साक्षात्कार के लिए) शास्त्रकारों द्वारा फलव्याप्यत्व का भी निषेध किया गया है, किन्तु ब्रह्म-विषयक अज्ञान के नाश के लिए चित्तवृत्ति की व्याप्ति तो अपेक्षित ही होती है। जबकि स्वयंप्रकाशमान होने के कारण (चैतन्य के) आभास का कोई उपयोग नहीं है।" (अन्वय-अस्य (साक्षात्काराया) शास्त्रकृद्भिः फलव्याप्यत्वम् एव निवारितम्; (किन्तु) ब्रह्मणि अज्ञाननाशाय वृत्तिव्याप्तिः अपेक्षिता। (पुनरपि) स्वयं प्रकाशमानत्वात् (चैतन्यस्य) आभासः न उपयुज्यते) जड़पदार्थ के आकार से आकारित चित्त की वृत्ति इससे भिन्न अर्थात् विशेष होती है, क्योंकि 'यह घड़ा है' इसप्रकार अज्ञात घटविषयक घट के आकार से आकारित चित्तवृत्ति, उसमें स्थित अज्ञान के विनाश के साथ, अपने में स्थित चित्-आभास द्वारा जड़रूप घट को भी प्रकाशित करती है। इसीलिए कहा गया है- "बुद्धि एवं उसमें स्थित चिदाभास ये दोनों (ही) घट में व्याप्त रहते हैं। उनमें बुद्धि द्वारा अज्ञान विनष्ट होता है तथा चिदाभास द्वारा घट की अभिव्यक्ति होती है।" जिसप्रकार दीपक का प्रभामण्डल अंधकार में रखे हुए घट-पट आदि को विषय बनाकर (सर्वप्रथम) उनसे सम्बन्धित अन्धकार को विनष्ट करने के साथ ही अपनी प्रभा से उसे भी प्रकाशित करता है। 'चन्द्रिका'- प्रस्तुत अंश को समझने के लिए सर्वप्रथम हमें यहाँ प्रयुक्त दो शब्दों 'वृत्तिव्याप्ति' एवं 'फलव्याप्ति' को स्पष्ट करना होगा। वस्तुतः किसी विषय के ज्ञान के क्रम में दो अवस्थाएँ होती हैं (क) वृत्तिव्याप्ति एवं (ख) फलव्याप्ति। (क) चक्षु आदि इन्द्रियों के माध्यम से अन्तःकरण द्वारा घट-पटादि विषयप्रदेश में पहुँचकर, तत्तत् वस्तु के आकार को धारण करना 'वृत्तिव्याप्ति' कहलाता है। (ख) घट-पट आदि विषयरूप में परिवर्तित अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित चिदाभास या उससे आच्छादितचैतन्य द्वारा, उस विषय का साक्षात् करना ही 'फलव्याप्ति' कहलाता है।