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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

२६२ वेदान्तसार प्रतिपादन को ही अभ्यास कहते हैं। जैसे-वहीं छान्दोग्योपनिषद् में अद्वितीय वस्तु परमब्रह्म शुद्धचैतन्य के बारे में 'तत्त्वमसि' इत्यादि का वर्णन करते हुए बार-बार इसका वर्णन किया गया है। अतः यही अभ्यास है। (३) अपूर्वता-प्रकरण में प्रतिपादन करने योग्य अद्वितीयवस्तु परमब्रह्म के बारे में यह प्रतिपादन करना कि अनुभवादि के अतिरिक्त अन्य सभी प्रमाण इसे सिद्ध करने में असमर्थ हैं, अर्थात् अन्य किसी प्रमाण का ब्रह्म के प्रतिपादन अथवा सिद्धि में सक्षम होना ही अपूर्वता कहलाता है। जैसाकि वहीं छान्दोग्योपनिषद् में-'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' इत्यादि श्रुतिवचनों के माध्यम से उपनिषदकार ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि उस अद्वितीयतत्त्व ब्रह्म को केवल उपनिषद्‌वचनों से ही जाना जा सकता है। उसकी सिद्धि में प्रत्यक्षादि सभी प्रमाण व्यर्थ हैं। यही प्रतिपादन अपूर्वता कहा जाएगा। अवतरणिका-इसी प्रसङ्ग को आगे बढ़ाते हैं- फलं तु प्रकरणप्रतिपाद्यात्मज्ञानस्य तदनुष्ठानस्य वा तत्र तत्र श्रूयमाणं प्रयोजनम्। यथा तत्र “आचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेवं चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य” इत्यद्वितीयवस्तुज्ञानस्य तत्प्राप्तिः प्रयोजनं श्रूयते। प्रकरणप्रतिपाद्यस्य तत्र तत्र प्रशंसनमर्थवादः। यथा तत्रैव “उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातं” इत्यद्वितीयवस्तुशंसनम्। प्रकरणप्रतिपाद्यार्थसाधने तत्र तत्र श्रूयमाणा युक्तिरुपपत्तिः। यथा तत्र “यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यं” इत्यादावद्वितीयवस्तुसाधने विकारस्य वाचारम्भणमात्रत्वे युक्तिः श्रूयते। मननं तु श्रुतस्याद्वितीयवस्तुनो वेदान्तानुगुणयुक्तिभिरनवरतमनुचिन्तनम्। विजातीयदेहादिप्रत्ययरहिताद्वितीयवस्तुसजातीयप्रत्ययप्रवाहो निदिध्यासनम्॥ पदच्छेद-फलम् तु प्रकरणप्रतिपाद्यस्य आत्मज्ञानस्य तद् अनुष्ठानस्य वा तत्र तत्र श्रूयमाणम् प्रयोजनम्। यथा-तत्र “आचार्यवान् पुरुषः वेद तस्य तावद् एव चिरम्, यावत् न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये” इति अद्वितीयवस्तुज्ञानस्य तत्प्राप्तिः प्रयोजनम् श्रूयते।