वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ वेदान्तसार वैश्वानर शब्द के प्रयोग प्रसङ्ग में ब्रह्मसूत्र में इनके नाम का दो बार उल्लेख हुआ है (1/2/21, 1/4/20)। अनेक विद्वान् इन्हें द्वैताद्वैत मत का सर्वाधिक प्राचीन आचार्य मानते हैं। ये परमात्मा और विज्ञानात्मा में भेदाभेद के समर्थक रहे। आचार्य शङ्कर एवं भामतीकार वाचस्पतिमिश्र ने इन्हें विशिष्टाद्वैतवादी सिद्ध किया है। इनके अनुसार परमेश्वर अनन्त होने पर भी उपासक के ऊपर अनुग्रह करने हेतु प्रदेशमात्र स्थान में प्रकट होते हैं। आगे चलकर इनके भेदाभेदवाद का यादवप्रकाश आदि द्वारा पल्लवन किया गया। (४) आचार्य औडुलोमि-ये परमतत्त्वज्ञानी थे। केवल ब्रह्मसूत्र में ही इनके नाम का उल्लेख हुआ है- (1/4/21, 3/4/45, 4/4/6)। मीमांसासूत्रकार ने इनके नाम का कथन नहीं किया है। ये भी वेदान्त के आचार्य तथा भेदाभेदवाद के समर्थक विद्वान् थे। इनके अनुसार-सांसारिक स्थिति में जीव और ब्रह्म में भेद होता है, किन्तु मुक्ति की स्थिति में इन दोनों में अभेद होता है। मीमांसक आचार्य आत्रेय के मत का खण्डन करने के लिए महर्षि बादरायण ने इनके मत का नामोल्लेखपूर्वक कथन किया है। ब्रह्मसूत्र में एक स्थल पर (4/4/51) ग्रन्थकार ने आचार्य जैमिनि के इस मत को प्रदर्शित करके कि-'मुक्त व्यक्ति ब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त होता है, वह निष्पाप, सर्वज्ञ तथा ऐश्वर्य आदि का अधिकारी हो जाता है' औडुलोमि के इस मत द्वारा खण्डन किया है कि 'चैतन्य ही आत्मा का स्वरूप है। इसलिए वह मुक्ति की अवस्था में चैतन्यमात्र को ही प्राप्त होता है। सत्य संकल्पत्व, सर्वज्ञत्व तथा सर्वेश्वरत्व आदि धर्मों की स्थिति उसमें नहीं रहती है। (५) आचार्य कार्ष्णाजिनि-ये आचार्य बादरायण एवं महर्षि जैमिनि से पूर्ववर्ती आचार्य प्रतीत होते हैं, क्योंकि ब्रह्मसूत्र में एक स्थल पर (3/1/9) तथा जैमिनिसूत्र में दो स्थलों पर (4/3/17, 6/7/35) इनके नाम का उल्लेख हुआ है। ब्रह्मसूत्रकार ने इनके मत का उल्लेख अपने मत के समर्थन में-पृथ्वी पर जीव के पुनरागमन के प्रसङ्ग में किया है। तदनुसार जीव अपने अवशिष्ट कर्मों (अनुशयभूत कर्म) के साथ ही पृथ्वी पर आता है। ये अवशिष्टकर्म ही उसकी अन्य योनि में कारण होते हैं। जबकि मीमांसासूत्रकार ने इनके मत का खण्डन करते हुए इनके नाम का उल्लेख किया है।