भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

समाधि-निरूपण २६९ (३) विद्वन्मनोरञ्जिनीकार स्वामी रामतीर्थ ने निर्विकल्पकसमाधि को असम्प्रज्ञात समाधि बताते हुए, इसे आलम्बनरहित प्रतिपादित किया है। (४) इससे पूर्व के गद्यखण्ड में प्रतिपादित श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि का समाधि के साथ आपेक्षिकमहत्त्व आचार्य शङ्कर भी स्वीकार करते हैं- श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि। निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम्॥ (५)प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-१ चित्र-५८ समाधि सविकल्पक निर्विकल्पक ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय में भेद प्रतीति होते हुए भी ब्रह्म की प्रतीति | ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय के भेद की प्रतीति का पूर्ण अभाव एकमात्र ब्रह्म की प्रतीति मिट्टी के हाथी के समान भेदप्रतीति होते हुए भी मिट्टीमात्र की प्रतीति के समान | सुषुप्ति अवस्था से भिन्नता | जल में नमक घुलने पर एकाकार प्रतीति (जल) के रूप में ब्रह्म की प्रतीति निर्विकल्पक समाधि में जल में नमक के समान वृत्ति की विद्यमानता रहती है। ब्रह्म के साथ उसके तादात्म्य के कारण आभास नहीं होता है। | सुषुप्ति में वृत्ति का पूर्णतया अभाव हो जाता है। अन्तःकरण के अपने कारणभूत अज्ञान में लय होने से। अवतरणिका-समाधि के दो भेदों का उल्लेख करने के बाद अङ्ग एवं उपाङ्गों का वर्णन करते हैं- अस्याङ्गानि यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयः। तत्र "अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः"। "शौचसन्तोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः"। करचरणादिसंस्थानविशेषलक्षणानि पद्मस्वस्तिकादीन्यासनानि। रेचकपूरककुम्भकलक्षणाः प्राणनिग्रहोपायाः

१. विस्तृत विवरण के लिए द्रष्टव्य भूमिका पृष्ठ...............।