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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 314 में से

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१६ वेदान्तसार सिद्धान्तों को ग्रहण भी किया है। इनके पुत्र का नाम सुमन्तु तथा पौत्र का नाम सत्वान था। इन्होंने सामवेद की राणायनीय नामक शाखा के जैमिनीय नामक नवम भेद की संरचना की। इस संहिता को कर्नाटक में विशेष सम्मान प्राप्त है। (प्राचीन चरित्रकोष, पृ. 236)। इसीप्रकार जैमिनीय ब्राह्मण तथा जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण नामक सामवेदीय ब्राह्मणग्रन्थों का भी इन्होंने प्रणयन किया। ये दोनों ही ग्रन्थ आज भी विद्यमान हैं। इसके अलावा इन्होंने जैमिनिसूत्र, जैमिनिनिघण्टु, जैमिनिपुराण, ज्येष्ठ- माहात्म्य, जैमिनिभागवत, जैमिनिभारत, जैमिनिगृह्यसूत्र, जैमिनिसूत्रकारिका, जैमिनिस्तोत्र तथा जैमिनिस्मृति इत्यादि ग्रन्थों की भी संरचना की। ये सामवेदी श्रुतर्षि थे। साथ ही ब्रह्माण्ड पुराण के प्रवर्तक ऋषियों की परम्परा में भी इनके नाम का उल्लेख मिलता है। आचार्य जैमिनि द्वारा विरचित 'जैमिनिसूत्र', 'पूर्वमीमांसा' अथवा 'कर्ममीमांसा' नाम से भी प्रसिद्ध है। यज्ञसम्बन्धी वाक्यों का अर्थविषयक मतभेद दूर करके अभिप्राय प्रदर्शित करना ही इस ग्रन्थ का मुख्य प्रयोजन है। इन्हीं सूत्रों से 'वाक्यार्थविचारशास्त्र' की उत्पत्ति मानी गयी है। इस ग्रन्थ के ग्यारह अध्यायों में कुल 2500 सूत्र हैं। सूत्रग्रन्थों में इन्हें सर्वाधिक प्राचीन माना गया है। 'जैमिनिसूत्रों' के ऊपर उपवर्ष की वृत्ति, शाबरभाष्य, प्रभाकरभट्ट की बृहती, कुमारिलभट्ट का वार्तिक, पार्थसारथिमिश्र की शास्त्रदीपिका, मण्डनमिश्र के विधिविवेक तथा भावनाविवेक, खण्डदेव की भाट्टदीपिका आदि व्याख्याग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। (प्राचीन चरित्रकोष, पृ. 236)। आचार्य जैमिनि ने यज्ञों में प्रयुक्त होने वाले ब्राह्मणग्रन्थों की वाक्यार्थों की अन्विति करने के लिए सूत्रों की रचना की, जिन्हें 'जैमिनिसूत्र' कहा गया। इसीकारण इसे पूर्वमीमांसा नाम से भी जाना गया। जबकि आचार्य बादरायण विरचित 'ब्रह्मसूत्र' में वेद के उत्तरभाग के रूप में प्रसिद्ध उपनिषद्वाक्यों का विचार किया गया है। अतः इसे उत्तर-मीमांसा के रूप में ख्याति प्राप्त हुई। (८) आचार्य बादरि-इनके मत का उल्लेख ब्रह्मसूत्र में पुनर्जन्म के विषय में छान्दोग्योपनिषद् के कथन 'तद् य इह रमणीयचरणाः' के सम्बन्ध में विविध आचार्यों के मत का उल्लेख करने के प्रसङ्ग में किया गया है।¹

  1. ब्रह्मसूत्र-1/2/30, 3/1/11, 4/3/7, 4/4/10