वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन्मुक्त-निरूपण २८७ संस्कार ही वास्तव में विनष्ट हो जाते हैं। इसलिए तत्त्वज्ञान के पश्चात् जीवन्मुक्तदशा में भी शुभवासनाओं की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप वह शुभ- कर्मों में ही प्रवृत्त होता है, अशुभ कर्मों में नहीं। पुनः जीवन्मुक्त की अग्रिम उत्कृष्ट अवस्था को कहते हैं-कुछ समय पश्चात् निरन्तर अभ्यास के परिणामस्वरूप शुभ-अशुभ दोनों प्रकार की भावनाओं के प्रति उसमें उदासीनभाव उत्पन्न हो जाता है, जो वस्तुतः इसकी उत्कृष्टता का ही द्योतक है। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन्मुक्त अवस्था में व्यक्ति यदि किसी भी कार्य में प्रवृत्त होता भी है तो, संस्कारवश उसकी प्रवृत्ति शुभकार्यों में ही होगी अथवा फिर शुभ-अशुभ के प्रति उसका उदासीनभाव रहेगा। अतः उसके द्वारा अशुभकर्मविषयक शङ्का करना पूर्णतया निराधार एवं भ्रामक है, क्योंकि तत्त्वज्ञान होने पर भी यदि वह अशुभकर्मों में प्रवृत्त होता है तो ऐसी स्थिति में हम मूर्ख एवं आत्मज्ञानी इन दोनों में भेद ही नहीं कर सकेंगे। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में उद्धृत करते हुए कहते हैं कि जिन तत्त्ववेत्ताओं ने अखण्डब्रह्म को भलीप्रकार समझ लिया है, वे कभी भी स्वेच्छानुसार आचरण नहीं करते हैं और यदि ऐसा नहीं होता तो जिसप्रकार कुत्ता भक्ष्य-अभक्ष्य के बारे में नहीं जानता है तथा अपनी भूख के अनुसार किसी भी प्रकार की वस्तु को खाने में प्रवृत्त हो जाता है, ठीक उसीप्रकार तत्त्ववेत्ता भी शुद्ध-अशुद्ध का ध्यान न रखते हुए प्रत्येक कार्य में प्रवृत्त होता, जबकि ऐसा देखा नहीं गया है। अतः हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि ब्रह्मज्ञानी का आचरण स्वच्छन्द नहीं होता है। या तो उसकी प्रवृत्ति शुभकर्मों में होती है या फिर शुभ-अशुभ के प्रति उसका उदासीनभाव रहता है। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को उद्धृत करते हुए जीवन्मुक्त की एक अन्य विशेषता का भी कथन करते हैं कि ब्रह्मवेत्ता जहाँ अपने कर्तापन के भाव को समाप्त कर देता है वहीं 'मैं आत्मज्ञानी हूँ' इसप्रकार के अहंभाव को भी वह त्याग देता है। इन दोनों भावनाओं के परित्याग की स्थिति में ही वह सच्चा ब्रह्मज्ञानी अथवा जीवन्मुक्त कहलाने का अधिकारी बनता है, अन्यथा नहीं। विशेष-(1) यहाँ प्रयुक्त अन्तिमपंक्ति उपदेशसाहस्री से उद्धृत है, जहाँ इन भावों को इसप्रकार अभिव्यक्त किया गया है-