वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपश्चाद्वर्ती अन्यान्य ग्रन्थों में भी वेदान्तदर्शन के कुछ आचार्यों के नाम का कथन किया गया है, जिनमें भर्तृप्रपञ्च, भर्तृहरि, भर्तृमित्र, उपवर्ष, बोधायन, ब्रह्मनन्दी, टङ्क, ब्रह्मदत्त, भारुचि, सुन्दरपाण्ड्य, आचार्य गौडपाद एवं आचार्य गोविन्द विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। अब हम इनका संक्षेप में विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं- (१) आचार्य भर्तृप्रपञ्च-इन्होंने कठोपनिषद् एवं बृहदारण्यकोपनिषद् पर भाष्य की संरचना की। ये प्रमाणसमुच्चयवादी आचार्य के रूप में विख्यात थे। इनके मत में लौकिकप्रमाण और वेद दोनों ही सत्य हैं। इसलिए इन्होंने लौकिकप्रमाणगम्यभेद तथा वेदगम्य अभेद दोनों को सत्य रूप में स्वीकार किया है। इनकी सम्मति में जिसप्रकार केवल कर्म मोक्ष का साधन नहीं होता है। ठीक उसीप्रकार केवल ज्ञान भी मोक्ष प्रदान नहीं करा सकता है। अतः मोक्षप्राप्ति के लिए ज्ञान-कर्म-समुच्चय ही उत्कृष्ट साधन है। उनके अनुसार-मोक्ष दो प्रकार का होता है (१) अपवर्ग (२) ब्रह्मभाव की प्राप्ति। इसी शरीर से ब्रह्मसाक्षात्कार होने की स्थिति में अपवर्ग होता है। जबकि देहपात के पश्चात् ही साधक को ब्रह्मभाव की प्राप्ति होती है। ब्रह्म में जीव का लय होने के कारण ही इसे 'ब्रह्मभावापत्ति' कहा गया है। इसीको 'परामुक्ति' भी कहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सुरेश्वराचार्य एवं आनन्दगिरि के समय में आचार्य भर्तृप्रपञ्च का ग्रन्थ उपलब्ध था, क्योंकि इन आचार्यों द्वारा इनके मत की प्रस्थापना एवं व्याख्या की शैली से इस बात की पुष्टि होती है। शङ्कराचार्य ने अपने बृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य में भर्तृप्रपञ्च के लिए परिहास रूप में 'औपनिषदमन्य' पद का प्रयोग किया है, किन्तु इससे उनके महत्त्व में किसीप्रकार की कमी नहीं होती है। वस्तुतः तात्कालिक समय में दार्शनिकक्षेत्र में इनके पाण्डित्य का पर्याप्त प्रभाव था। इसीकारण शङ्कराचार्य के साक्षात् शिष्यों ने भी अपने ग्रन्थों में 'सम्प्रदायवित्' एवं 'ब्रह्मवादी' कहकर इनकी प्रशंसा की है। उनके मत में-'परमार्थ एक भी है और अनेक भी। ब्रह्मरूप में वह एक है तथा जगत् के रूप में अनेकरूपों वाला है। इसीकारण उन्होंने ज्ञान एवं कर्म दोनों की सार्थकता को स्वीकार किया। उनकी दृष्टि में जीव में विद्या, कर्म तथा पूर्वकर्म के संस्कार विद्यमान रहते हैं। परमात्मा से अभिव्यक्त हुई