भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 314 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

२८ वेदान्तसार शतश्लोकी, दशश्लोकी, सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह वाक्यसुधा, पञ्चीकरण, प्रपञ्चसारतन्त्र, आत्मबोध, मनीषापञ्चक, आनन्दलहरीस्तोत्र इत्यादि। आचार्य शङ्कर का सिद्धान्त अद्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध है, तदनुसार उन्होंने ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य समस्त जगत् को मिथ्या प्रतिपादित किया (ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या) एतदर्थ उन्होंने मायावाद की स्थापना की। इसे विद्वानों ने उनका अमोघमन्त्र बताया, जिसके माध्यम से उन्होंने ब्रह्म एवं जगत् विषयक पहेली को सुलझाकर विद्वानों के समक्ष रखा। उनके अनुसार सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् ब्रह्म का विवर्तमात्र है। जैसे हमें रज्जु में सर्प की भ्रान्ति हो जाती है, ठीक उसीप्रकार ब्रह्मतत्त्व में ही हमें जगत् की भ्रान्ति हो रही है। उन्होंने आत्मा को स्वतःसिद्ध माना। उनके मत में मोक्ष एक व्यावहारिक सत्य है। इसे प्राप्त करने के लिए उन्होंने ज्ञान, कर्म एवं उपासना सभी की उपादेयता को स्वीकार किया। इसीकारण उनका सिद्धान्त केवल विद्वानों, ज्ञानियों एवं योगियों के लिए ही उपयोगी नहीं, अपितु सामान्यव्यक्ति के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। आचार्य शङ्कर के परवर्ती वेदान्तदर्शन के आचार्यों की परम्परा अत्यन्त विशाल रही है। यहाँ हम उनका संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं- (२२) पद्मपादाचार्य-ये शङ्कराचार्य के प्रथम शिष्य थे। इनका पूर्वनाम सञ्दन था। दक्षिण के चोलप्रदेश में इनका जन्म हुआ। ये गुरु के परमभक्त एवं आज्ञापालक थे। पद्मपाद नाम इन्हें शङ्कराचार्य ने दिया था। एक बार जब उग्रभैरव नामक कापालिक ने शङ्कराचार्य की बलि चढ़ानी चाही तो आचार्य पद्मपाद ने ही उसका वध किया। शङ्कराचार्य ने इन्हें पुरी के गोवर्धनमठ का अध्यक्ष बनाया। इन्होंने अपने जीवनपर्यन्त अद्वैतमत का प्रचार किया। इनका एक अपूर्ण ग्रन्थ पञ्चपादिका, आत्मानात्मविवेक, प्रपञ्चसार तथा सुरेश्वराचार्यकृत लघुवार्तिक की टीका उपलब्ध हैं। पञ्चपादिका में शरीरक भाष्य के केवल चार सूत्रों की व्याख्या की गई है। जिसपर प्रकाशात्ममुनि की विवरण नामक टीका तथा इसपर भी अखण्डानन्दमुनि की तत्त्वदीपन नाम की टीका मिलती है। आचार्य पद्मपाद के शिष्यों में से ही दशनामी संन्यासियों की 'आश्रम' और 'अरण्य' शाखाएँ निकली हैं।