वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ वेदान्तसार इस प्रसङ्ग में एक प्रश्न स्वाभाविकरूप से उठता है कि स्वयंप्रकाश, चित्स्वरूप, अपरिच्छिन्न ब्रह्म अथवा आत्मा को जड़, परिच्छिन्न, अव्यापक अज्ञान द्वारा किसप्रकार आवृत किया जाता है? इस सम्बन्ध में वेदान्तशास्त्रियों ने अत्यन्त सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है-'अज्ञान की आवरणशक्ति सीमित होते हुए भी असीम आत्मा अथवा ब्रह्म को उसीप्रकार आवृत कर लेती है, जिसप्रकार विशाल आकार वाले प्रकाशपुञ्ज सूर्य को मेघ का छोटा सा टुकड़ा आच्छादित कर लेता है। अज्ञानी व्यक्ति, मेघ द्वारा दृष्टि के आच्छन्न होने पर सूर्य को मेघ से ढका हुआ मानता है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति मुक्त आत्मा को बन्धनयुक्त समझता है- घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं यथा मन्यते निष्प्रभं चातिमूढः। तथा बद्धवद् भाति यो मूढदृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा।। (हस्तामलक-10) (६) ईश्वर- यह सामान्य सिद्धान्त है कि प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इसलिए सम्पूर्ण चराचरजगत् को देखकर यह अनुमान सहज ही किया जा सकता है कि इसका भी कोई कारण होना चाहिए, जिससे यह उत्पन्न हुआ है। वेदान्तदर्शन इस प्रपञ्च का कारण ईश्वर को स्वीकार करता है। अब प्रश्न उठता है कि यह ईश्वर क्या है? यद्यपि अद्वैतवेदान्त में एकमात्र चैतन्यतत्त्व परमब्रह्म की सत्ता को सर्वोपरि स्वीकार किया गया है, जो नित्य, शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव तथा अविकारी है तथापि माया की समष्टिगत उत्कृष्ट उपाधि से युक्त एवं माया की उपाधि से विवर्जित इन दो भेदों को भी मान्यता प्रदान की गई है।¹ माया की समष्टिगत उत्कृष्ट उपाधि से युक्त होकर निर्गुण ब्रह्म ही सगुण बन जाता है। इसीको 'ईश्वर' संज्ञा दी गई है।² इसे सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वनियन्ता, अन्तर्यामी, जगत् का कारण एवं आनन्दमय माना गया है। ईश्वर के इन गुणों एवं विशेषणों का प्रतिपादन श्रुतिग्रन्थों में अनेकशः देखने को मिलता है।³
- द्विरूपं हि ब्रह्म अवगम्यते, नामरूपविकारभेदोपाधिविशिष्टं, तद्विपरीतं च सर्वोपाधिविवर्जितम् (ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य- 1/1/11)
- तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत्। (पञ्चदशी-3/40)।
- मुण्डकोपनिषद्-1/1/9, कठोपनिषद्-2/3/3, श्रीमद्भगवद्गीता 18/61,