भारतकोश
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 314 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

५६ वेदान्तसार स्वाभाविक क्रिया है, जिसप्रकार पुरुष के शरीर से केश और लोम स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। (७) जीव-जैसा कि पूर्व में हम कह चुके हैं कि अद्वैतवेदान्त निकृष्टोपाधिभूतव्यष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य को 'जीव' संज्ञा प्रदान करता है। इसप्रकार जीव अविद्या से अवच्छिन्नचैतन्य है तथा अविद्या, कर्म, शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण इसकी उपाधियाँ हैं। यहाँ इसे शरीरेन्द्रियरूपी पिञ्जरे का अध्यक्ष तथा कर्मफल का भोक्ता माना गया है। शङ्कराचार्य ने देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि उपाधियों से परिच्छिन्न परब्रह्म को ही शरीरधारी जीव कहा है।¹ इसप्रकार ब्रह्म, ईश्वर एवं जीव इन तीनों में तात्त्विकभेद न होकर केवल उपाधि मात्र का ही भेद है। इनमें जीव स्थूल एवं सूक्ष्मतत्त्वों का संगठन है। चैतन्य इसकी प्रमुख विशेषता है। दूसरे शब्दों में शरीर, बाह्य और अन्तःकरणों से युक्त चैतन्य का नाम ही जीव है। इसका तीन प्रकार के शरीरों से सम्बन्ध रहता है-(1) स्थूल (2) सूक्ष्म एवं (3) कारण शरीर। जीवभाव को प्राप्त करने की स्थिति में चैतन्य स्थूलशरीर धारण करता है, जिसे वह मृत्यु के समय साँप की केंचुली के समान छोड़ देता है। श्रीमद्भगवद्गीता ने इसे पुराने वस्त्र को छोड़ने के समान कहा है- वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। (2/22) स्थूलशरीर एवं सूक्ष्मशरीर का सम्बन्ध पञ्चकर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि तथा पञ्चप्राण से है, जिसका हम आगे विस्तारपूर्वक उल्लेख करेंगे। स्थूल भोगों का आयतन होने के कारण स्थूलशरीर को अन्नमयकोश की संज्ञा दी गई है। मन, बुद्धि आदि उपर्युक्त 17 तत्त्वों से युक्त सूक्ष्मशरीर में मनोमय, प्राणमय तथा विज्ञानमय कोशों की स्थिति मानी गई है। अद्वैतवेदान्त की मान्यता के अनुसार जीवात्मा इसी सूक्ष्मशरीर के द्वारा इहलोक का परित्याग करके परलोक में प्रस्थान करता है अथवा एक स्थूलशरीर को छोड़कर दूसरे स्थूलशरीर में प्रवेश करता है। अपनी सूक्ष्मावस्था के कारण यह स्थूल नेत्रों द्वारा दिखाई भी नहीं देता है।

  1. पर एवात्मा देहेन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिभिः परिच्छिद्यमानो बालैः शारीर इत्युपचर्यते (ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य-1/2/6)।