वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ वेदान्तसार स्वामी रामतीर्थ अहङ्कार का अन्तर्भाव मन में करते हैं। उनके अनुसार अहङ्कार भी सङ्कल्पात्मक ही होता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार सूक्ष्मशरीर को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-२ सूक्ष्म शरीर (17 अवयव) 5 5 5 1 1 पञ्च ज्ञानेन्द्रिय पञ्च कर्मेन्द्रिय पञ्च वायु बुद्धि मन श्रोत्र त्वक् चक्षु रसना घ्राण प्राण अपान व्यान समान उदान (जिह्वा) वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ (वाणी) (हाथ) (पैर) (गुदा) (मूत्रेन्द्रिय) इसी प्रसङ्ग में इनका पृथक्-पृथक् परिचय देना उपयुक्त होगा। (क) पञ्चज्ञानेन्द्रिय-श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना और घ्राण इन्हें ज्ञानेन्द्रियों की श्रेणी में रखा गया है। इनकी उत्पत्ति आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के सात्त्विक अंशों से पृथक्-पृथक् रूप में मानी गयी है। ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यानि। एतान्याकाशादिनां सात्त्विकां- शेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक्-पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते (वेदान्तसार)। अर्थात् आकाश के सात्त्विक अंश से श्रोत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है। इसका कार्य श्रवण करना है, क्योंकि शब्द आकाश का गुण है। अतः यह शब्द की ग्राहक है। इसीप्रकार अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत वायु के सात्त्विक अंश से त्वक् नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई, क्योंकि स्पर्श वायु का गुण है। अतः त्वगेन्द्रिय शीतल या उष्ण स्पर्श का ज्ञान कराती है। इसके अतिरिक्त अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत अग्नि के सात्त्विक अंश से चक्षु नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई और अग्नि का गुण है, रूप। इसलिए चक्षु नामक इन्द्रिय दर्शन कराती है। इसीप्रकार अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत 'जल' के