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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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६४ वेदान्तसार चित्र-४ अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी [ रजोगुण प्रधान अंशों से क्रमशः ] वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ (वाणी) (हाथ) (पैर) (गुदा) (जननेन्द्रिय) बोलना कार्य करना चलना मल उत्सर्जन आनन्द एवं सन्तति उत्पत्ति (ग) पञ्चवायु- प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान ये पाँच वायु हैं। इनकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुण अंश से स्वीकार की गई है। इनका शरीर के विभिन्न अङ्गों में वास माना गया है। जैसे-नासिका के अग्रभाग पर विराजमान वायु 'प्राण' है। यह ऊर्ध्व गमनशीला है। (प्राणो नाम प्राग्गमनवान् नासाग्रस्थानवर्ती-वेदान्तसार) किन्तु ब्राह्मणग्रन्थों में इसकी स्थिति हृदय में स्वीकार की गयी है। (प्राणी हृदये-तैत्तिरीयब्राह्मण 3/10/8/5)। पुनरपि हृदय में स्थित होते हुए भी प्रत्यक्षरूप से नासिका के अग्रभाग पर अवस्थित होने के कारण इसका नासिका के अग्रभाग पर स्थित होना ही विद्वानों को स्वीकार्य रहा है (वेदान्तसार विद्वन्मनोरञ्जनीकार) अपान नामक वायु को गुदा एवं उपस्थ (जननेन्द्रिय) में स्थित माना गया है। नाभि के नीचे की ओर जाना इसका स्वभाव है। सम्भवतः इसीकारण इसे अधोगमनशीला कहा गया है। इसीप्रकार 'व्यान' नामक वायु का स्वभाव सभी ओर गमन करना है। अतः इसकी स्थिति सम्पूर्णशरीर में स्वीकार की गई है। प्रतिदिन खाए हुए अन्न पानादि को पचाने वाली, उदर में निवास करने वाली वायु ही 'समान' है। इसका प्रमुख कार्य उदरस्थ अन्न से साररूप रस निकालकर उसका रुधिर आदि के रूप में परिपाक करना तथा अवशिष्ट अन्न को मल-मूत्र के रूप में बाहर निकलना है। उदान वायु का निवास कण्ठ में होता है। ऊर्ध्वगमन इसका स्वभाव है। अतः मृत्यु के समय शरीर