वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८ वेदान्तसार अर्थापत्ति के दो भेद माने गए हैं—(1) दृष्टार्थापत्ति (2) श्रुतार्थापत्ति (सा चार्थापत्तिर्द्विविधा-दृष्टार्थापत्तिः श्रुतार्थापत्तिश्चेति"। इनमें दृष्टार्थापत्ति के अन्तर्गत वस्तु या व्यक्ति को देखकर विरोध के परिहार के लिए स्वयं अन्य कारण की परिकल्पना की जाती है। जैसे-उक्त उदाहरण में प्रतिदिन देवदत्त के दिवाभोजन को न देखकर, उसके स्थूलत्व को देखते हुए व्यक्ति स्वयं ही उसके रात्रिभोजनरूप अर्थ की परिकल्पना कर लेता है। अतः यह दृष्टार्थापत्ति प्रमाण का विषय कहलाएगा। इसके विपरीत इसीविषय को स्वयं न देखकर किसी अन्य व्यक्ति से देवदत्त का स्थूलत्व एवं दिवाभोजन का अभाव सुनकर उसके रात्रिभोजन की परिकल्पना श्रुतार्थापत्ति का विषय कहलाएगी। इसीको अन्य उदाहरण द्वारा भी इसप्रकार समझ सकते हैं। (जीवित) श्याम नामक व्यक्ति घर में नहीं है। अतः वह घर से बाहर होगा। उसका घर से बाहर होना रूप अर्थ श्रुतार्थापत्ति का विषय माना जाएगा। (vi) अनुपलब्धि (अभाव)— अभावरूप अर्थ की सिद्धि के लिए वेदान्तदर्शन 'अनुपलब्धि' नामक प्रमाण को मान्यता प्रदान करता है। संख्या की दृष्टि से इस दर्शन में यह छटा प्रमाण है। वेदान्तदर्शन किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति के अभाव को कारणजन्य न होने के कारण प्रत्यक्ष आदि पूर्व में कहे गए पाँच प्रमाणों द्वारा ज्ञान कराने में असमर्थ मानता है। उनके मत में घट का अभाव इन्द्रियसन्निकर्ष के अभाव में प्रत्यक्षप्रमाण द्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याप्तिसम्बन्ध के अभाव में इसे अनुमान द्वारा भी ग्रहण नहीं किया जा सकता है। इसीप्रकार सादृश्यज्ञान न होने से घट के अभाव के ज्ञान को उपमानप्रमाण से भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं। साथ ही शब्दप्रमाण भी आप्तवाक्य के अभाव में 'वस्तु के अभाव' रूप ज्ञान को कराने में सक्षम नहीं है। अतः इसके लिए 'अनुपलब्धि' रूप छठे प्रमाण को मान्यता प्रदान करना आवश्यक है। इस प्रसङ्ग में यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि वेदान्तदर्शन घट आदि पदार्थों के अभाव के ज्ञान में अनुपलब्धि से अभिप्राय सामान्य अनुपलब्धि से नहीं, अपितु योग्य अनुपलब्धि से ग्रहण करता है। इनके मत में-अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा इन्द्रिय आदि द्वारा प्रत्यक्ष करने योग्य घट-पट आदि के अभाव का ज्ञान ही सम्भव है, ऐसे पदार्थ जो इन्द्रियों की पहुँच