भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( १०७ ) नाज्ञातं सर्वं जगत् ज्ञातं भवति येन ब्रह्मसाक्षात्कारेणासा- क्षात्कृतं साक्षात्कृतं भवति ब्रह्मणः सर्वतः संप्लुतोदकस्थानीय- त्वादित्यर्थः । अवशिष्टाया उपपत्तेर्लक्षणमाह । प्रकरणेति । तामुदाहरति । यथेति । मृद्विकारेषु घटादिषु विकारनाम- धेययोर्वाचारंभणमात्रत्वेन तथामृन्मयत्वमेवावशिष्यते ना- न्यत्तथा चिद्विवर्तस्य प्रपञ्चस्य गिरिनदीसमुद्रात्मकविकारना- मधेययोर्वाचारंभणमात्रत्वाच्चिन्मात्रमेवावशिष्यते रज्जुविव- र्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रावशेषवदित्यर्थः ॥ ९० ॥ (भा०टी०) जिस प्रकरणमें जो वस्तु प्रतिपादन करने- के योग्य हा उस प्रकरणमें आदिसे लेकर अन्त पर्य्यन्त उसी वस्तुका प्रतिपादन करना उपक्रमोपसंहार कहाताहै। जैसाकि छान्दोग्य के षष्ठ अध्याय की आदिमें (एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म) “अद्वितीय ब्रह्मही एकहै”और अन्तमें भी “यह आत्माही ज- गन्मय है”इस प्रकार प्रकरणका प्रतिपाद्य वस्तु अद्वितीय ब्रह्मका ही प्रतिपादन कियाहै। इसी प्रकार जिस प्रकरणमें जो वस्तु प्रतिपादन करनेके योग्यहै उसी वस्तुका वारम्वार प्रति- पादन करना अभ्यास कहाता है। छान्दोग्यके षष्ठाध्यायमें ही जिस प्रकार “तत्त्वमसि” इस वाक्यद्वारा अद्वितीय ब्रह्मका नौ ९ वार प्रतिपादन कियाहै । जिस प्रकरणमें जो वस्तु प्रति- पादन करने योग्य हो उस वस्तुके प्रमाणसे अतिरिक्त प्रमाण- के विषयको छोडकर उसी वस्तुके प्रतिपादन करनेको अ- पूर्वता कहते हैं। उसी षष्ठाध्यायमें ही केवल उपनिषदोंके प्र-