भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

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( ३२ ) वेदान्तसार । ( सं०टी० ) उपाधिद्वयावच्छिन्नौ प्राज्ञेश्वरौ सप्रपंचं नि- रूप्येदानीं अनवच्छिन्नं तुर्यं चैतन्यं लक्षयति । वनेति । यथा स्थूलवनोपाध्यवच्छिन्नाकाशापेक्षया सूक्ष्मवृक्षोपाध्यवच्छि- न्नाकाशापेक्षया च महाकाशस्य तदुभयाधारतयानवच्छिन्न- त्वान्महाकाशत्वं तथा कार्यकारणोपाधितदवच्छिन्नचैतन्यद्व- यापेक्षया तदाधारभूतयदनवच्छिन्नं सर्वव्यापिचैतन्यं विशुद्धं तत्तूरीयमुच्यत इत्यर्थः।अस्य चैतन्यस्य तुरीयत्वंवक्ष्यमाणवि- श्वाद्यपेक्षयेति द्रष्टव्यं।अस्मिन्नर्थे श्रुतिं संवादयति।शान्तं शिव- मिति।आदिपदात् “त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोगश्चयद्भवेत् तेभ्योविलक्षणः साक्षीचिन्मात्रोहंसदाशिवः ” इत्यादिश्रुत्यं- तरग्रहः ॥ ३३ ॥ ( भा०टी० ) जैसे वन और वनमें स्थित आकाश, वृक्ष और वृक्षमें स्थित आकाश, जलाशय जलाशयप्रतिबिम्बित- आकाश और जलप्रतिबिम्बित आकाशका आश्रय जो अपरि च्छिन्न आकाश उसको महाकाश कहते हैं।तिसीप्रकारसमष्टि और व्यष्टिभूत अज्ञान औरअज्ञानोपहित चैतन्यादिका आधार जो अपरिच्छिन्न चैतन्य उसको तुरीय ब्रह्मचैतन्य कहते हैं । इसमें श्रुतिका भी प्रमाण है—“मङ्गलमय अद्वितीय चैतन्यको चतुर्थ ( तुरीय ) कहते हैं और उसीको आत्मा और वि- ज्ञेय भी कहते हैं” ॥ ३३ ॥ इदमेव तुरीयं शुद्धचैतन्यमज्ञानादितदुपहितचैत-