भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 145 में से

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ४९ ) लिंगशरीरस्य स्वबुद्धिविषयत्वेनानेकबुद्धिविषयतया व्यष्टित्व मित्यर्थः। तत्र दृष्टांतमाह । वृक्षवदित्यादि । उक्तसमष्ट्यवच्छि- न्नचैतन्यस्य सूत्रात्मत्वादिसंज्ञां दर्शयति । एतदिति । तत्र हेतु- माह । सर्वत्रानुस्यूतत्वादिति। सर्वप्राणिलिंगशरीरेष्वनुस्यूतत्वा- द्विद्यमानत्वादित्यर्थः । हेत्वंतरमाह । ज्ञानेच्छेति । ज्ञानेच्छा- क्रियाशक्तिमत्कोशत्रयोपाध्यवच्छिन्नत्वादित्यर्थः ॥ ४८ ॥ ( भा०टी० ) जैसे वन और तालाब, वृक्ष और जलका समष्टि है। तिसी प्रकार समस्त सूक्ष्मशरीर एकरूपसे शरीर समष्टि है इसी प्रकार जैसे वृक्ष और जल, वन और ताला- वका व्यष्टि है । तिसीप्रकार अनेक रूपद्वारा शरीर व्यष्टि है। इसी सूक्ष्मशरीरका समष्टिरूप उपाधिसे उपहित चैतन्यको सू- त्रात्मा, हिरण्यगर्भ और प्राण कहाजाता है । इसी कारण यही चैतन्य वस्त्रमें स्थित सूत्रकी तरह सबमें परिव्याप्त तथा ज्ञान, इच्छा और क्रियाशक्तिविशिष्ट अपञ्चीकृत पञ्चभूत का अभिमानी होता है ॥ ४८ ॥ अस्यैषा समष्टिः स्थूलप्रपंचापेक्षया सूक्ष्मत्वात् सूक्ष्मशरीरं विज्ञानमयादिकोशत्रयं जाग्रद्वासना- मयत्वात् स्वप्नः । अत एव स्थूलप्रपंचलयस्थान- मिति चोच्यते । एतद्व्यष्ट्युपहितं चैतन्यं तैज- सो भवति तेजोमयान्तःकरणोपहितत्वात् ॥ ४९॥ ( सं०टी० ) विज्ञानमयादिकोशत्रयस्य सूक्ष्मशरीरतां ३

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