भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 145 में से

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पृष्ठ 62

( ६२ ) वेदान्तसार । महाप्रपंचत्वं दर्शयति। एतेषामिति । तत्र दृष्टांतमाह। यथे- ति । यथा धवखदिरपलाशाद्यवांतरवनानां समष्टिः समुदा- यविवक्षया एकं महद्वनं भवति । यथा वा वापीकूपतडागा- द्यवांतरजलाशयानां समष्टिः समुदायविवक्षया एको महाज- लाशयो भवति । तथैतेषां स्थूलसूक्ष्मकारणावांतरप्रपंचानाम- पि समष्टिः समुदायविवक्षया एको महान्प्रपंचो भवतीत्यर्थः । एतदेवावांतरमहाप्रपंचोपहितानां विश्वतैजसप्राज्ञानां वैश्वान- रहिरण्यगर्भाव्याकृतानां चावांतरवनावच्छिन्नाकाशवदवांतर- जलाशयगतप्रतिबिंबाकाशवच्चाभेदइत्याह। एतदुपहितमिति ॥ ( भा०टी० ) जिसप्रकार अलग अलग वनोंकी समष्टिसे एक बड़ा वन हो जाताहै । तथा अलग अलग तालावोंकी समष्टिसे एक बड़ा तालाव होजाताहै इसीप्रकार स्थूल कारण और सूक्ष्म शरीरके प्रपञ्चकी समष्टिसे एक बडा प्रपञ्च होजा ताहै जैसे सम्पूर्ण वनावच्छिन्न आकाश और यावत् जलाश- यगत प्रतिबिम्बित आकाश एकही आकाश है तिसीप्रकार स- म्पूर्ण प्रपञ्चावच्छिन्न वैश्वानर, विश्व, हिरण्यगर्भ, तैजस और प्राज्ञ और ईश्वर यह सब एकही चैतन्य है ॥ ६१ ॥ आभ्यां महाप्रपञ्चतदुपहितचैतन्याभ्यां तप्तायःपिण्डवद्विविक्तं सत् अनुपहितं चैतन्यं "सर्वं खल्विदं ब्रह्मैव" इति महावा- क्यवाच्यं भवति विविक्तं सल्लक्ष्यमपि भवति। (सं०टी०) चैतन्यप्रपंचयोर्भेदे “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इति